Wednesday, January 7, 2015


                      प्रश्न-चिह्न
चांद  और  सूूरज  की किरणों  में  जरा  भी फर्क हो
तो ज्वार-भाटा भी समुन्दर की सरहद को तोडते हैं
आंधीयो  के  पथ - प्रखरता  से  बदल  जायें  अगर
तो  मौत  के अरमान  को  भी बस्तीयो में मोडते है

अब  आग  की  लपटें उगलते  हैं  सियासी सरगना
रक्त  के  उस  वक्त  को ,  केवल  धरा  ही  बोलती हेै
मौन  होकर  कत्ल  के उन  खंजरोे   के  मंजरो को
इतिहास  के आभाष से बस,लाश को ही खोलती है

कत्ल भी कुर्बानियो के शब्द से सज कर संवर कर
तालीम  की  कर्कस किताबों मे सूशोभित हो रहे हैं
आतंक के  इतिहास भी तो आज की जर्जर जरा से
क्यों सम्प्रदायों की  अदा  से,आदमियत खो रहे हेैं

मजहबी, कौमो, कबीलों, जातियों  के  जमघटो में
बे -पनाह,इस भीड  में बस, आदमी ही  मर रहा हेै
ये खून  चाहे, सम्प्रदायी  हो  किसी  भी  कौम का
आदमी  का  कत्ल  तो  बस,आदमी ही कर रहा है

जब तक सियासी सूरमा, इस सल्तनत में आयेंगें
तब तक  धरा  की ये  त्वरा,जर्जर जरा को ढोयेंगी
रहनुमा,मजहब,धरम्  के, खूनी इबारत पढ रहे है
उन  किताबों  से  तो  केवल   पीढिया  ही खोयेंगी

अब इस तरह  के  धर्म, धरती से सिमटने चाहियें
अब मानवों  से  मजहबी कुडमें भी मिटने चाहियें
बस, मर्म  की  जो जोडदे, माला वो मनके चाहियें
अब  जर्रे - जर्रे  में  चमक वाले  वो कनके चाहियें

इन रूढियो को तोडने  क्या कोई फरिस्ता आयेगा
इन्शानियत, ईमान का क्या  कोई रिस्ता आयेगा
क्या  देवदासी  ये  धरा,  बनकर  धरा  में  रोयेगी
क्या आग भी अपना हूनर,चिन्गारियो से खोयेगी।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ( आग )
                    मो0 9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

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