अहिसुष्णता
प्रजातन्त्र का मन्दिर संसद, बीहड, दस्यु धाम हो गया
सम्प्रदाय,मजहब,का डबरा आज अवध अभिराम हो गया
डाकू, चोर, लुटेरे, खूनी, चर्चा का पेैगाम हो गया
खादी कुर्ता, धोती, टोपी, अय्यासी अन्जाम हो गया
संख्या बल से दल की हलचल, तीर विषैले छोड रही है
अहिसुष्णता फैल रही है जनमानस को तोड रही हेै
अपशब्दों की भांषा, परिभांषा के पासे जोड रही है
सविंधान के हर पन्ने को, अपने हित में मोड रही है
भारत का ये प्रजातन्त्र तो अब पशुओं की डार हो गयी
न्यायपालिका, न्याय व्यवस्था,जीर्ण-सीर्ण बेकार होगयी
वेतन, भत्ता, पेन्शन खाने, पाने की सरकार हो गयी
इस भारत की राजनीति अब प्रजातन्त्र के पार हो गयी
इस अग्निकुण्ड में टी.वी. चैनल पूरा ईंधन डाल रहे है
लोकतन्त्र की लुटि लाज को सारे चैनल पाल रहे है
सब सम्पादक अब नेता की औकातें खंगाल रहे है
प्रतिभाओं से शब्द विषैले, अपने स्वर में ढाल रहे है
कंही राम राज,कंही काम राज,कंही आम राज की बातें हैं
नेता का कुछ काम नही हेै, बातों से रोटी खाते हैं
हम इनके पीछे दौड रहे हैं, ये जनमत औकाते हेैं
अलग-अलग दस्यु के बीहड, अन्दर से रिस्ते नाते हैं
भरी जवानी में यौवन, भारत का भाग्य कुचल डाला
खिलने से पहले शैशवता का सुकुमार पुष्प मशल डाला
मुर्दे अब भी तैयार खडे, खुद जीवन स्वंय लुटाने को
कवि आग मजबूर खडा है, गीत वतन के गाने को।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815

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