Monday, March 21, 2016

          बूरा ना मानो होली है
ना जाने  कितने रंगो  की  होली होती है
हास्य-व्यंग में हर फन की बोली होती है
आज जगत में खून  रंग से रंग जाता है
फाग,राग का आग जगत में फैलाता है
अखवारों में जगह जगह खूनी होली है
ये समाचार पर्याय भ्रष्ट का हमजोली है
समाचार    बलात्कार ,श्रृगांर स्वयं ही बन जाता है
इन  खबरों से  सम्पादक  रोटी खाता हेै
नवभारत हो दैनिक हो या अमर उजाला
दर्पण ,हिन्दुस्तान ,खबर गडबड घोटाला
राजनीति  के चोर उचक्कों की खबरें है
ये  शब्दों के  सागर  क्यों खूनी डबरें हैं
     यहाॅं प्रतिबन्ध है खसरों पर पटटे जारी हैं
राजस्व    अब तो मालिक एस,डी,एम है पटवारी हैे
     मठ,मन्दिर भी इनके चक्कर काट रहे हैं
     राष्ट्र सम्पत्ति,  ग्राम  सभा को बाॅंट रहे हैं
अव्वल,दोयम छाॅंट छाॅटं कर बतलाते हैं
इस विभाग  में नेता जी  के कई खातेंहैं
खसरा और खतौनी दाखिल खारिज देखो
भूमिधर  बनना  है  तो  बस,  पैसे  फेंको
   पुलिस  पर्व  होली  है  कैसा रंग बिरंगा
    पुलिस       शहर शान्त है फिर भी नित होता है दंगा
   थाना  मंदिर  है  नेता और व्यापारी का
   मजबूरी  व्यवसाय  बना  है लाचारी का
चौराहों  पर  तास  चैकडी   जमी  हुयी है
तमाशबीन,ये मित्र पुलिस भी रमी  हुयी है
हर  गली , मुहल्ले ,चौराहे  में  बेचो  दारू
उत्तराखण्ड की पुलिस मित्र है देख जूझारू
अधिवक्ता जज मुजरिम की है एक ही बोली
 न्यायालय में  देखो  रंग   रंगीली  होली        
    वकील     अन्याय  न्याय पर रंग घोल कर डाल रहा है
 अघिवक्ता जज मिलकर मुजरिम पाल रहा है
गीता  की  कसमें खातें हैं फिर भी पंगा
न्यायालय  में  देखो  ईश्वर,अल्ला नंगा
राजनीति  संरक्षण   में चलती  है गोली
जज,नेता, अधिवक्ता ,खेलो  खूनी होली
                        ठेकेदार  ही असली  होली   खेल  रहे हैं
साइफन,सडक,गूल,फाइल में पेल रहे है      
ठेकेदार रंग   बिरंगी   थैली  सबको  बाॅंट  रहे है
पुस्ते ,बाॅंध ,सडक फाइल में छाॅंट रहे हैं
र्निमाण  नियन्ता, दारू  मुर्गा बन जाता है
सडक  सेतु  को बरसाती  नाला  खाता है
एम0बी की पिचकारी रंग मंे रंगजाती है
निर्माण नियन्ता अभियन्ता टस्कर हाथी है
अधिकारी  बाबू  भी तो होली खेल रहा है
विभागीय ये रंग  बिरंगी फाइल दफ्तर झेल रहा है
कलम बनी पिचकारी भ्रष्टा चार उगलती
अधिकारी  और  बाबू से तो सत्ता पलती
ये  मेरूदण्ड है व्यभिचारी भ्रष्टा चारी का
काम यहाॅं पर  होता है बश, फनकारी का
प्रजातन्त्र  का  हर विभाग में पक्का रंग है
बस, इनकी  होली  के रंगों से  राष्ट्र   दंग है
 ये सरकारी गु रूकुल कै सा शिशुनिकेतन
 सारे  गूरू  जी  माॅंग   रहे   हैं उॅंचा वेतन      
शिक्षा सारी   अर्थ  व्यवस्था घर की सरकारी है
घर में के0जी0एल,के0जी0शिक्षा जारी है
गुरूजी और गुरू पत्नि दोनो ही टीचर है
अपने ही बच्चों का देखो क्या फ्यूचर है
ब्रह्मचर्य  की  मजबूरी  को  झेल  रहे  हैं
अपनी -अपनी  होली  दोनो खेल रहे हैं
ढूॅंढ  ढूॅंढ  कर  दीन  दुखी बच्चे आतें हैं
खबरें मिलती हैं गुरूजी राशन खाते  हैं
इस शिक्षा से कौन शिशू अव्वल आता है
     नवअंकुर को शिशुनिकेतन क्यों खाता है
एक कनैह्या जे.एन.यू. का बाप हो गया
सूभाष,भगत,बिसमिल्लाह अभिषाप हो गया
हिटलर,जिन्ना की तैयारी में ये बच्चे हेेै             विद्याार्थी
ये पके हुये फल दिखते हैं पर कच्चे हेेै
                       भविष्य देष का चैराहो पर दोेड रहा हेेै
                       तेल नही हे बस धूवा ही छोड रहा हेै
                       राजनीति का ईन्जन पीछे लगा हुआ है
                       भविष्य देश का मुर्दा है पर जगा हुआ है
सदन अखाडा  साॅंडो  की कुस्ती होती है
चुन करके सिर  धुन करके जनता रोती है            नेता
शब्दों  की  पिचकारी  से  रंग  बरसाते हैं
होली   नेता   नही   खेलते  बष  खाते हैं
हरे  भरे  खेतों  में  क्यों उगती है झाडी
हर  खादी  में  छिपे  हुये हैं ये कलमाडी
ना जाने  कितने घोटलों का रंग जाल हेै
नेता जी  का   चेहरा  देखो  सुर्क लाल है
शक्तिमान  की  टांग टूटि सब झूम रहे हेेैं
उत्तराखण्ड  में  घोडे, खच्चर  घूम  रहे हैं
ठाकुर  की  सरकार  दांव  पर लगी हुयी है
पूरे  देश  मे  बी. जे. पी. ही जगी हुयी है
                      देख चिकित्सक कैसी  होली खेल रहा है
                      स्वास्थ व्यवस्था मुर्दा,जिन्दा झेलरहा है        
    डाक्टर         रक्त चाप मल मूत्र जाॅंच का सूत्र बनाओ
                      सबसे  पहले रोगी को  सूगर  दिखलाओ
सूगर   वाले   पक्के  ग्राहक  बन  जाते है
सभी  चिकित्सक  रोगी  से  रोटी खाते हैं
व्यवसायी उपचार  चिकित्सा को भाती है
जिन्दे को तो कफन चिकित्सा पहनाती है
                       व्यवसायी का माल मिलावट ही धन्धा है
         व्यापारी   ये ढेड अरब की आबादी घर-घर अन्धा है            
                      बे - मतलब   के  बच्चे  पैदा  हो   जाते है
                     व्यवसायी और जनसंख्या के गहरे नाते हैं
नंगी  जंघायें  तन   पर  केवल  चोली  है
ये नंगा तन ही फिल्मी दुनिया की होली है
कैटरीना, षिल्पा और राखी  देख विपासा   फिल्मि दुनिया
यौवनता  में काम-सूत्र  कैसी अभिलाशा
                        मधुबाला ,नर्गिस हो हेमा, राखी, रेखा,    
                        बिन-ब्याही माताओंको दुनिया ने देखा
                        गोविन्दा अमिताभ हमें क्योे भाजाते  है
                        एक  करोड  में केवल पुटठे मटकाते  हैं
सब रंगों का मिश्रण मठ मन्दिर में पाओ
होली और दीवाली  मिलकर रोज मनाओ
उर्वषी, मेनका, रम्भा  के नित दर्शन होते          आश्रम
इन्द्र  द्वार  पर  मंजनू से सिर पकड के रोते
                         रंग  बिरंगी परीयाॅं गुरू  से  खेल  रही है
                         मठ  मन्दिर के बह्मचर्य को झेल रही है
                         परदेशी फुलझडियाॅं आसन  में सोती है
                         मठ मन्दिर में मस्ती की होली होती है
ये महा कुम्भ है हर रंगो की खेलो होली
भाषण गोंण करो  शब्दों की  बोलो बोली
अपने अपने  भावों की सब भंग चढाओ
व्यंग जंग को छोडो मिल कर रंग लगाओ
                         दिल  मं जो गुब्बार छिपे हैें बाहर छोडो
                         उलझे  धागों  मे ,फागों के रंग निचोडो
                         देखो  रंग रंगीली  दुनिया बन  जायेगी
                         प्रेम  पुनः  होली हर  झोली में लायेगी
     राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
            मो0 9897399815
   rajendrakikalam.blogspot.com  

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