Sunday, March 27, 2016

देव-दानव-द्वन्द
देव-भूमि में दिग्गज दानवखेल रहे हैं
संविधान के पन्ने सत्ता झेल रहे हैं
इन्द्र,कुबेर सब काया, माया बांट रहे हैं
पाले कुत्ते ही मालिक को काट रहे हैं

राम-भक्त रावण की नीति अपनाते हैं
सभी विभीषण सत्ता से रोटी खाते है
हनुमान भी पूंछ दबाकर खडा हुआ है
जामवन्त निर्जीव धरा में पडा हुआ है

लक्ष्मण,मेघनाथ भी गोली खेल रहे हैं
भरत,शत्रूघ्न अवध में होली खेल रहे हैं
त्रिजटा,ताडका,सीता माँ को बहलाती है
गीत सुमंगल,मन्दोदरी,कैकयी गाती है

दशाशीश, रघुनाथ सियासत देख रहे हैं
जामवन्त दुविधा में आंशू फेंक रहे हेैं
दानव - देव ,दलाली के दीदार हो गये
देव भूमि में दुश्मन सारे यार हो गये

नंगे - भूखे छप्पन भोगों की आशा में
राष्ट्र-भक्त भी राष्ट्र द्रोह की अभिलाशा में
असमंजस में चार धाम भी मौन खडे हेैं
सब पूछ रहे है ईश्वर से ये कौन धडे हैं

ठाकुर,पण्डित,वैश्य,शुद्र ही अवतारी हेैं
उर्वशी,मेनका,रम्भा जैसी कई नारी हैं
योग-भ्रष्ट सब इन्द्रासन की तैय्यारी में
यक्ष,देव, दानव,किन्नर सब तकरारी में

ये दानव संग्राम शिखर को तोड रहा हेै
भूत,प्रेत, जिन्न, देव-धरा में दौड रहा है
हम देवभूमि में निशाचरों को पाल रहे हेैं
कवि आग तो लपट में ईंधन डाल रहे हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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