शिखरों के स्वर
मौन है अविचल हिमालय राष्ट्र-रक्षा के लिये
ग्लेशियर गलता है तो गंगा सुरक्षा के लिये
हम सींचते हेैं देश को बस आबोदाने के लिये
मजबूर हॅूं मैं अब सियासत् को डिगाने के लिये!!
हे ! पर्वत के परं वीर , तुम प्रहरी हो प्रमाण बनो
संकट हेै पथ कंटक का तूरीण, धनुष और बाण बनो
जन-जन की दृष्टि है तुम पर,तुम उठो पुनः परित्राण बनो
ये प्रखर वेदना पर्वत की कहती हैे तुम कल्याण बनो
शिशुओं की तरह सियासत् में हम जिन्हें पकड़कर लाये थे
ये मोहरे थे सतरंजो के जो हमने स्वयं बिछाये थे
हम सीधे - साधे लोगो को ये शकुनि समझ नही पाये
शिखरों की शस्य सियासत में ये डाकू बीहड से आये
हे!शिखरों के स्वाभिमान कुछ ऐसी अलख जगादो अब
जिनसे भी दगा मिला हमको उस दल में आगलगादो अब
जो खडे़ तुम्हारे कारण हैं, उनको अहसास दिलादो अब
ये खेल नही हैे दिल्ली का, उनको ये खेल सिखादो अब
दरिया दिली दलालों से क्यों शीश शिखर का झुकता है
क्यो गंगा,यमुना का जल भी इस प्रदूषण से ऱुकता है
सर्कस के सारे जोकर ही अब घूम रहे हैं तारों में
बीहड के डाकू छिपे हुये हैं चुनी हुयी सरकारों में
जिस देव-भूमि का मालिक ही करता हो खेल करोडों में
जो मुकुट हिमालय भारत का रखता लावारिस रोडो में
जो नंगी - भुखी जनता के मन्दिर में चुनकर आते हों
जो आंख मूंंद कर नर-भक्षी बस, लाश हमारी खाते हों
अब जुते मारो उन सबके, इस देव - भूमि से दूर करो
थोडी भी इज्जत बाकी हो,पकडो और हमले क्रूर करो
जितना भी अब तक लूटा है,सब सासन से सम्बद्ध करो
उत्तराखण्ड में रहने के, अधिकार सभी के ऱद्द करो
आदिकाल से शिखरों पर असुरों का आना -जाना है
क्यों दुनिया भर के चोरों का ये उत्तराखण्ड ठिकाना है
धर्मो की भांषा बोल रहे हैं डाकु टी0 वी0 चैनल पर
कवि आग की लपटों से ये, आग लगादो पैनल पर।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815

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