यह राष्ट्रीय रचना आज के परिपेक्ष में है,कृपया ध्यान से पढें।
अखण्ड कल्पना
आर्यखण्ड अब हो अखण्ड,अवतार धरा में आजाये
बहुत हो गया घनानन्द, अब और धरा को ना खाये
जोड़ सके जो भारत को, समृद्व भेष वो माॅंग रहा हॅूं
मै बस भारत माता से, चाणक्य देश में मांग रहा हूं
वशुधैव कुटुम्बकम् की भांषा, दुनिया भर में गाते हैं
कल्याण जगत का करने को होम,यज्ञ करवाते हैं
सद्भाव जीव का हो दिल में ये धर्म सनातन नारा है
आज शास्त्र संवादों में, क्यों मानवता से हारा है
धर्म-गुरू क्यों मौन खडे़, इस मायावी जंजालों में
शमशान शवों में ढूॅंढ रहे हैं,शास्त्र मरे कंकालों में
यहाॅं वशिष्ठ कण्व और वाल्मिकी रघुवंश को गातें हैं
उपनिषद, वेद का सार,व्यास,गीता में हमें सुनाते हैं
अखण्डराष्ट्र की परिभाषा हम को इतिहास बताता है
भू-मण्डल भारत ही होगा ,ये शास्त्र सदा से गाता है
धर्म शास्त्र भी कहते है ये जगत ब्रह्म सा नेक बने
उपनिषद, वेद की भाषा में बस, मानवता ही एक बने
राम , कृष्ण अवतारों का प्रमाण यहाॅं पर मिलता है
ये भरत -वंश का भारत है,भावों से सदा पिघलता है
ब्रह्मांडअखिल,अखिलेश्वर की स्वर्ग, मोक्ष फुलवारी है
यंहा महाकुम्भ में ,देवों से, दानवता हरदम हारी है
बलि, कर्ण कंही परशूराम कंही हरीश्चंद्र से दानी थे
जाने कितने ऋषि, मुनि,चाणक्य, विदुर से ज्ञानी थे
शेखर,सूभाष और भगत सिंह मरते हैं यहाॅं जूनूनों में
क्यों उसी राष्ट्र में आज यहाॅं बहता है पानी खूनो में
सती अहिल्या, लक्ष्मी ,पुतली रण में प्राण गंवाती हैं
यहाॅं परम्परायें नारी का इतिहास हमेशा गाती हैं
दुर्भाग्य देशका आज यंहा व्यभिचार सियासत होती है
बलात्कार, कू - कर्मो से अबलायें , हरदम रोती हैं
मुझे बताओ भारत के अब कितने टुकडे़ काटोगे
सरदार पटेल के सपनो को किस्तों में कितना बाॅंटोगे
छत्तीसगढ़ कंही उत्तराखंड कंही झारखंड, बुंदेलखड
मैं आग धधकती देख रहा हॅूं हर प्रदेश में,महा प्रचण्ड
हम कैसे खटिक,कसाई हैं वक्षस्थल माॅं का काट दिया
क्षेत्र,मजहब की जाति ने कितना भारत को बाॅंट दिया
अंग्रेज हूकूमत भारत के दो टुकडे़ करके चली गयी
ये ,बे -शर्मो की औलादें क्यों करती हैं अब बात नयी
राजनीति की हरकत ही सम्मान राष्ट्र का खोती है
भारत की जनता शदियों से इस महाभारत को ढोती है
पहले भी सभी रियासत थी,हमने कुछ राज्य बनाये थे
कुछ दुश्मन थे इस भारत के जो हमसे सदा पराये थे
मैं पुनरावृत्ति देख रहा हॅूं राजतंत्र फिर से आयेगा
क्या उजडे हुये कबीले का कोई राष्ट्रगीत भी गायेगा
कुल चार खण्ड हों भारत के सरकार मध्य में राज करे
लोक -तंत्र चौपाया हो, जो राजनीति से ना बिखरे
पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चर्तुमुखी हो देव धरा
ये चार-युगों के चार-खण्ड ,हो चतुर्वेद की वशुन्घरा
परिलक्षित होगा आर्यखण्ड भारत की चार दिशाओं से
मैं उस भारत को देख रहा हॅू, जन मानस के भावो से
पूरे भारत का जन-मत बश एक सूत्र में आ जाये
राष्ट्र-भक्ति की भांषा में भारत के पुत्र समा जायें
दिशा,निशा सब एक बने, दिनकर हो सोम,व्योम जैसा
एक जाति हो मानवता बश, यज्ञ ,होम हो कुछ ऐसा
कब तक हम औलादों को, इन झगडों से निपटायेंगें
खण्ड-खण्ड की चोंटों से अब कितने घाव लगायेगें
क्यों होती है धर्म,मजहब की वैमनस्यता, मुझे बताओ
जम्बूद्वीप पुनः विकसित हो राष्ट्र गीत कुछ ऐसा गाओ
कोई तो चन्द्रगुप्त ढॅूंढो,जो शल्य चिकित्सा कर जाये
एक सूत्र में भारत का ,ये मानचित्र फिर से आये
धर्म,मजहब की वशुन्धरा में, मां की इज्जत पहचानो
जो शहीद हुये इस धरती पर,इतिहास पुनः उनका जानो
कौटिल्य,कुटिल,कर्कश वाणी हृदय में सरस सरलता हो
पञ्च-विकारों से हट कर बस, भारत अन्दर पलता हो
हो आर्यखण्ड ऐसा अखण्ड ,इस आशा से संघर्ष करे
जो मातृ-भूमि के चरणो में निज ईश,शीश को सदा धरे
ये चार युगों का चिन्तन हेै, बस,आर्य-खण्ड हो देव-धरा
ये मृत्यु-लोक से उपर है ,जहाॅं काल तपो से सदा मरा
अखण्डराष्ट्र के भावों की ये आग शिखर पर टाॅंग रहा हॅूं
मैं तो बस भारत माता से, चाणक्य देश में मांग रहा हूँ।।
राजेन्र्द पऱ्साद बहुगुणा(अाग)
9897399815

No comments:
Post a Comment