Monday, May 4, 2015

              उत्कण्ठा      
देश   की   बे - चैनिया   बढने लगी हैं
चींटिया वट - वृक्ष  पर   चढने लगी हैं
ग्लेशियर  से  बर्फ क्यों झडने लगी हेै
मौसमों की  हर फसल  सढने लगी है

भू-कम्प  से धरती बराबर हिल रही है
ये आपदाएं  दीनता  को   छिल रही है
दुश्मनो के घर कलि क्यों खिल रही हेै
ये  हवा,  ढूँढो  कंहा  से  मिल  रही है

अब   सहन    होती  नही  दुस्वारियाँ
चल   रही    सीने  में सबके आरियाँ
क्यों फड फडाती है ध्वजो की धारियाँ
मौन  हेै  क्यों, राष्ट्र   की  नर-नारियाँ

हर  तरफ संकट बराबर  दिख  रहा हेेै
भाग्य-भारत  का भरोसा लिख रहा हेै
आदमी  चौराहे  पर  क्यों बिक रहा है
अब कंहा सिद्यान्त है, जो टिक रहा है

मौन  है ,इतिहास  भी तो सुन रहा हेै
अब शहीदों का सफर सिर धुन रहा है
षडयन्त्र  से सत्ता,सियासी बुन रहा है
भीड  में पागल को पागल चुन रहा है

हर जगह बे-वक्त  हम दिल खोलते हैं
जो  भी मूँह  में आ गया,वो बोलते हैं
हैशियत   दुश्मन   हमारी   तोलते हैं
जख्म में भी हम जहर खुद घोलते है

शब्द  की   बाजीगरी  ही  चल  रही हेै
सौेदागरी भी शब्द  की ही खल रही है
अब आश्वासन  से  गरीबी पल रही है
राजनीति  ही तो  सब को छल रही है

कीमतें खादी   लिबासों  की  गिरी  है
राष्ट्र  की इज्जत  इन्ही से ही फिरी है
तस्वीर  माँ  भारती  की क्यों चीरी है
हर जगह नेताओं  की ही किरकीरी हेै

सब का  भरोशा छोड  कर आगे  बढो
इतिहास कुछ,जिन्दे  जवानी के गढो
जिस लक्ष्य से नेता गिरे उसपर चढो
ये राजनीति  मर गयी,अब तुम लडो

मृत - शवो  का अब  भरोशा  छोड दो
पाखण्ड  की  ये रूढियाँ  सब  तोड दो
कोैमों, कबीलो,जातियों  को  जोड  दो
राष्ट्र  को  फिर से  नया  कुछ  मोड दो

चारों  तरफ   से   सरहदें  पुकारती है
आज संकट  में   पढी   माँ  भारती है
वो मर रही है, जो जंहा  को  तारती है
इस सत्य को मेरी  धरा  ही धारती है

मजबूर हूँ  मैं आग ही  सुलगा रहा हूँ
हर  लपट से  गीत माँ  के  गा रहा हूँ
कुछ बचे,जिन्दे हैे मेरी  सर जमीं  में
इस गीत से ही मैं,उन्हे समझारहा हूँ
  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
         मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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