Tuesday, May 26, 2015

               परीक्षा से पहले परिणाम
कुछ के  अच्छे दिन आने हैं,कुछ के बूरे दिन आने हेैं
सात  दशक  से राजनीति में गिने,चुने ये ही गाने हैं
काग,गिद्व,गीदड जंगल के सत्ता का  सुख भोग रहे हैं
जो जनमत से हार गये हैं वो प्रजातन्त्र में रोग रहे हैं

इस  सत्ता  में  हार  गये जो, च्वनप्रास ही चाट रहे हैं
स्मृति रानी, अरूण  जेतली, पूरी  मस्ती  काट रहे हैं
संघ,जंग  के  रंग  सियासी  सत्ता  रण में कूद पडे हैं
पी.एम,सी,एम. कोई  भी  हो, इनके  ही वजूद बडे हैं

तुमने पन्द्रह  लाख  दिये ,अब  कांग्रेस गाडी बाटेगी
फर्जी  नेता, मूरख  जनता प्रजातन्त्र  है फिर छाटेगी
मेरे  बाप  का  क्या जाता है जो मूंह में आये बोलूंगा
भूखे - नंगे जनमत की औकात  देख कर ही तोलूंगा

लेबर  सस्ती, बंजर  धरती  सब  परदेशी  देख रहे हैं
अनुमानो  से नाप तोल कर भीख बराबर फेक रहे हैं
शेखचिल्लि के सपनो में ही पूराभारत  मस्त खडा हैे
प्रतिष्पर्धा में सभी भिखारी झगड रहे हैं कौन बडा है

केवल जनता ही विधवा है श्वेताम्बर  को  देख रही है
राजनीति के इन साण्डों पर कातर दृष्टि   फेंक रही हेै
हानीमून मनाने वाले ,साण्डो  से  भयभीत  खडी हेै
मेरे देश मेंराजनीति ही व्यभिचार की  मुख्य कढी है

नंगे भूखे अच्छे दिन की परिभांषा को समझ पायेंगे
बूरे दिनो  में जीने  वाले मध्य - वर्ग  ही  तो आयेगे
नीचे गिरना, उपर उठना, इधर कूँआ है उधर खाई है
मध्य-वर्ग की जोरू भैय्या आज सियासी भौजायी है

काले-धन  के  सारे  खाते  खंगाले  तो खाली निकले
भांषण  के बड-बोले  बाबा,नेता सभी मवाली निकले
सुन्दर सुन्दर शब्दो मे श्रृंगार उछलकर  बोल रहा था
कवि आग भी नेताओ की गन्द,द्वन्द में  डोल रहा था।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com  

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