Wednesday, May 27, 2015

 यह रचना बडे खिन्न मन से लिखी  गयी है, पाठकों से निवेदन है कि यदि रचना अच्छी लगे तो अवश्य धर्म के उन ठेकेदारों तक पहुंचाइये जो  आज कल टी.वी. चैनलों पर गाय माता की  वकालत कर रहे हैं, तभी यह रचना सार्थक होगी ।                

                         धेनू-वेदना
धर्म,  धेनू   और  धरा   व्यभिचार   से  लाचार  है
ये  सनातन   की  धरोहर   क्यों    बनी  व्यापार है
संगठन  बनते  तो  हैं  पर  क्यों   सुरक्षित  है नही
कुछ तो कमी  है  आस्था  में  जो  हमें दिखती नही

अवलम्ब है जो इस धरा  की  आज  क्यों  चौराहे में
मूक  हो  कर  क्यों   खडी  धेनू  धरम्   के साये में
धर्म   के   उद्घघोष  में   जयकार  होती  जा रही  है
आज  मेरे  देश   में  गऊ   गन्दगी  क्यों खा रही है

तैंतिसों   कोटि   के    देवों   को   हृदय  में  धारती
गौ-धाम की  नित  हो  रही मठ  मन्दिरों में आरती
घर   से    बेघर   हो   रही   धेनू  सनातन  देश  में
गौ  सेवकों   को   देख   लो   आडम्बरों  के भेष  में

आश्रम  व्यवस्था चल  रही  है  गाय माॅं के नाम से
नित बन   रहे  हैं  संगठन  गौ - वंश  के  पैगाम से
ऐसी  व्यवस्था    आश्रमों    के   हाथ  होनी चाहिये
हे!---   विरक्तों   काम - धेनू    को    सुरक्षा  चाहिये

ये दिव्य रचना  ब्रह्म  की  मानव  परीक्षा  ले  रही है
युग -युगों   से  नाव  मानव   की  धरा में खे रही है
आडम्बरी ,   अज्ञानता    धेनू     सुरक्षा     गायेगी
वेदना  गौ -  वंश  की  इस  सृष्टि  को   खा  जायेगी

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,इसाई  में ना माँ को बांटिये
मजहबों  के  मर्म  से, ममता   ना  मां  की काटिये
माँ नही, सब  बैल, बछडों  की   हिफाजत  कीजिये
मदिरा  समझ मां के  हृदय  की वेदना मत पीजिये

बस ! एक  रोटी  हर  घरों  से  गाय माॅं  के नाम की
ये  धरोहर   फिर   बनेगी   अास्था    घनश्याम की
सम्पन्न  होगी  ये  धरा   गौ - वंश  ही  के नाम से
मोक्ष  की   परिकल्पना   है   शास्त्र  में  गो-धाम से।।

              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
352 चन्द्रेष्वर मार्ग नावघाट मायाकुण्ड ऋशिकेष
                मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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