Thursday, May 28, 2015

   गुर्दा है,पर मुर्दा है
सेवा   करना  राजनीति   का   काम   नही है
नेताओ  में  राष्ट्र  -  भक्ति  का   नाम  नही है
मजहब,  कौम,  कबीले   बीहड  बन  जाते हैं
ये  सभी  नमूने  बीहड से  चुन  कर  आते हैं

जब  जैसा  बीज  पडेगा, फल  वैसा  आयेगा
अब प्रजातन्त्र  का  राष्ट्र - गीत   डाकू गायेगा
सम्भ्रान्त प्रान्त से रिपुदमन चुनकर आते है
लोक - तन्त्र  है , जन- मत जोकर बहलाते है

हम  डेढ  अरब  के मुर्दो  के  शमशान घाट है
मुर्दो  में  भी  जाति,मजहब के अलग बाट है
कुछ  मुर्दो   के  शब्दो   में   भी  चमत्कार हेै
इन  सभी   दलो   में   ऐसे  मुर्दे  दो - चार है

ये  कबर  के  बिज्जू लाशों को  ही छाँट रहे है
वतन   के   टुकडे   मुर्दे   ही  तो   काट रहे है
कुछ  सडी  गली  लाशों ने ऐसे  जाल बिछाये
मेरे   देश   में   सभी   पडोसी    नंगे   आये

चोर, उचक्के , डाकू   के   हम   भी  पोषक हैे
हम  बीहड  के  पालक  है, हम  ही  शोषक है
किस्म-किस्म  की  व्याधि, खादी पाल रही है
जनता भी सब देख  रही  है,  बस,टाल रही है

मैं  भी  मुर्दा हूँ, लेकिन कुछ  को जगा रहा हूँ
ग्लूकोष  के  छन्द   कलम   से  लगा रहा हू
प्रतिभा  तो  है, कुछ में, लेकिन मौन पढी है
ये  भी  तो  मुर्दे  प्रजातन्त्र  की   एक कडी है

कुछ  मुर्दो  को कर्कसता  भी  जगा  ना पायी
मुझे  बताओ  भारत  का   क्या   होगा  भाई
तीन  दशक  से  मैं भी  जीवन  खपा  रहा हूँ
फेस - बुको  में  केवल   कविता  छपा रहा हूँ

चेतनता   के   भाव   हृदय  में  आ  जाते हैं
कुछ  जिन्दो  को  मुझ   जैसे   मुर्दे  भाते हैं
यही सोचकर कुछ ना कुछ  लिखता जाता हूँ
मै  कवि  आग  हूँ शब्द   शवों के ही गाता हू ।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     ऋशिकेष
              मो09897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com  

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