(राघवेन्द्र अवस्थी जी की टिप्पणी पर)
साध्वियां राजनीति के मंच पर क्यों जातीं ? उमा भारती का उद्देश्य और अभीष्ट क्या है ?
उनके कौसेय वस्त्र धारण करने का अर्थ क्या है ?
गंगा की अविरलता के लिए उनका स्टैंड क्या है ?
पिछले एक बरस के दौरान गंगा कितनी और कहाँ -कहाँ मुक्त हुई ....क्या वे बताएंगी ?
गंगा के लिए अपने जीवन काल और मंत्री काल में उनका संकल्प क्या है ?
उन्हें आज अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ...
राघवेंद्र अवस्थी ,
गंगा की वेदना
नित बन रही अट्टालिका गंगा नदी के तीर में
मल-मूत्र देखो मिल गया माता के निर्मल नीर में
आश्रमों मठ मन्दिरों से मल छलकता जारहा है
भगवान का ही भेष भागीरथ की गंगा खारहा है
जल में मल की हल चलों से बन गया अमृत जहर
आज तो धर्मात्मा भी कर रहा माॅं पर कहर
सुर सरीता शौच स्थल हर नगर हर गाॅंव में
क्रीडा-स्थल हो गया व्यवसाय बन कर नाॅंव में
जहान्नवी का नीऱ अब बाजार में भी बिकरहा है
मौन हिन्दुस्तान है ,स्पष्ट सब को दिख रहा है
मर रही है मछलियाॅं हर घाट पर बे भाव से
नासूर बनता जा रहा है क्यों धर्म अपने घाव से
युग - युगों से फूॅंकते हैं हम शवों को तीर पर
विष की वृष्टि हो रही माता के निर्मल नीर पर
आश्रमों की गन्दगी गंगा ही ढोती जा रही है
माॅंता शिशू के कर्म से अस्तित्व खोती जा रही है
गति धार माॅं की रोक कर बस डाम बनते जायेंगें
अधर्म की इस आस्था से हर मजहब मिट जायेंगें
स्नान देवों का यहाॅं होता था निर्मल नीर से
आॅंशू टपकते देखता हूॅं ,माॅं के हृदय में पीर से
गौमुख से गंगा सागरों तक जल से जीवन बाॅंटती
निश्चल धरा की ये धरोहर पाप सबके काटती
धर्म से और कर्म से व्यवसायी रोटी खा रहा है
घाट पर ढोंगी भगत गंगा की गाथा गा रहा है
ये धर्म की अवघारणा अन्तर्मुखी का योग है
आज तो व्यवसाय में गंगा बनी बस भोग है
मन भी निर्मल नीर सा स्वछन्द बहना चाहिये
वात्सल्यता की सुरसरि को निष्कपट मन चाहिये
गंगा सुरक्षा की समीति बन रही हैं हर घाट पर
धर्म के व्यवसायी देखो जी रहे हैं ठाट कर
क्यों सनातन सुर सरिता राष्ट्र - गंगा हो रही है
बैकुण्ठ की पहचान डबरोंमें सिमटकर खो रही है
छोड दो गंगा को गंगा पर स्वयं बच जायेगी
कौन कहता है कि माॅं अपने शिशू को खायेगी
ये हमारी धारणा माॅं के प्रणय को तोडती है
गंगा सनातन राष्ट्र को वात्सल्यता से जोडती है
मठ ,आश्रमों की गंदगी गंगा में जब तक आयेगी
क्या कलयुगी भागीरथों से आबरू बच पायेगी
तीर्थ तट जहान्नवी से मन विरक्तों मोड दो
माॅं की त्वरा और धार को माॅं के हवाले छोड दो!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
352 चन्द्रेष्वर मार्ग नावघाट मायाकुण्ड ऋशिकेष
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
साध्वियां राजनीति के मंच पर क्यों जातीं ? उमा भारती का उद्देश्य और अभीष्ट क्या है ?
उनके कौसेय वस्त्र धारण करने का अर्थ क्या है ?
गंगा की अविरलता के लिए उनका स्टैंड क्या है ?
पिछले एक बरस के दौरान गंगा कितनी और कहाँ -कहाँ मुक्त हुई ....क्या वे बताएंगी ?
गंगा के लिए अपने जीवन काल और मंत्री काल में उनका संकल्प क्या है ?
उन्हें आज अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ...
राघवेंद्र अवस्थी ,
गंगा की वेदना
नित बन रही अट्टालिका गंगा नदी के तीर में
मल-मूत्र देखो मिल गया माता के निर्मल नीर में
आश्रमों मठ मन्दिरों से मल छलकता जारहा है
भगवान का ही भेष भागीरथ की गंगा खारहा है
जल में मल की हल चलों से बन गया अमृत जहर
आज तो धर्मात्मा भी कर रहा माॅं पर कहर
सुर सरीता शौच स्थल हर नगर हर गाॅंव में
क्रीडा-स्थल हो गया व्यवसाय बन कर नाॅंव में
जहान्नवी का नीऱ अब बाजार में भी बिकरहा है
मौन हिन्दुस्तान है ,स्पष्ट सब को दिख रहा है
मर रही है मछलियाॅं हर घाट पर बे भाव से
नासूर बनता जा रहा है क्यों धर्म अपने घाव से
युग - युगों से फूॅंकते हैं हम शवों को तीर पर
विष की वृष्टि हो रही माता के निर्मल नीर पर
आश्रमों की गन्दगी गंगा ही ढोती जा रही है
माॅंता शिशू के कर्म से अस्तित्व खोती जा रही है
गति धार माॅं की रोक कर बस डाम बनते जायेंगें
अधर्म की इस आस्था से हर मजहब मिट जायेंगें
स्नान देवों का यहाॅं होता था निर्मल नीर से
आॅंशू टपकते देखता हूॅं ,माॅं के हृदय में पीर से
गौमुख से गंगा सागरों तक जल से जीवन बाॅंटती
निश्चल धरा की ये धरोहर पाप सबके काटती
धर्म से और कर्म से व्यवसायी रोटी खा रहा है
घाट पर ढोंगी भगत गंगा की गाथा गा रहा है
ये धर्म की अवघारणा अन्तर्मुखी का योग है
आज तो व्यवसाय में गंगा बनी बस भोग है
मन भी निर्मल नीर सा स्वछन्द बहना चाहिये
वात्सल्यता की सुरसरि को निष्कपट मन चाहिये
गंगा सुरक्षा की समीति बन रही हैं हर घाट पर
धर्म के व्यवसायी देखो जी रहे हैं ठाट कर
क्यों सनातन सुर सरिता राष्ट्र - गंगा हो रही है
बैकुण्ठ की पहचान डबरोंमें सिमटकर खो रही है
छोड दो गंगा को गंगा पर स्वयं बच जायेगी
कौन कहता है कि माॅं अपने शिशू को खायेगी
ये हमारी धारणा माॅं के प्रणय को तोडती है
गंगा सनातन राष्ट्र को वात्सल्यता से जोडती है
मठ ,आश्रमों की गंदगी गंगा में जब तक आयेगी
क्या कलयुगी भागीरथों से आबरू बच पायेगी
तीर्थ तट जहान्नवी से मन विरक्तों मोड दो
माॅं की त्वरा और धार को माॅं के हवाले छोड दो!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
352 चन्द्रेष्वर मार्ग नावघाट मायाकुण्ड ऋशिकेष
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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