Thursday, May 21, 2015

 नवोदय का उदय
राष्ट्र  के कवि,राष्ट्र के उपर कभी लिखते नही हैं
एक हम  है,जो  कभी चौराहो मे बिकते नही है
ऐसा  नही  है  कि , हमारी  कीमतो मे  दाग है
हम  अभागे  हैं ,हमारे   शब्द   मे बस,आग है

मंच  मे प्रपंच करने  की  कला  नही जानते हैं
राष्ट्र के सम्भाव  को साहित्य अपना मानते हैं
चुटकुले सुनने, सुनाने  के  हुनर आते  नही हैं
भाट,चारण की कविता  मंच  पर गाते नही हैं

सरस्वति  के  दान को बाजार  मैं नही बेचते हैं
पाखण्ड  को  चौराहे  में  बूरी  तरह से थेचते हैें
हाथ में जबतक कलम है भाट बन सकते नही
श्रृंगार की  सूखी  नदी  के घाट बन सकते नही

चापलूसो  की  जमातों  से   सदा  हम   दूर हैं
वक्त  की  तासीर  मे  समसीर  के  हम  शूर हैं
खुलके गाते है, भयंकर  छन्द की  हर चोट से
छल,कपट  को  फोडते है,शब्द के विस्फोट से

हम एक  ही कविता  को  पूरे देश में गाते नही
इसीलिये तो राष्ट्र के कवियों को हम भाते नही
हर विषय  पर  चोट  करते  है  हमेशा छन्द से
लेखनी  से  जूझते  हैं, राष्ट्र   की   हर  गन्द से

रोज लिखने का हुनर माँ शारदा से मिल रहा है
आसियाने मे नवोदय पुष्प हरदम खिल रहा है
रोंदने  वालो  की  नजरो से  अगर  बच  पायेगें
तुम देख लेना गीत हिन्दुस्तान का हम गायेगें

बहती हुयी इस सरस्वति  में एक नाला चाहिये
इस  तमस  को  दीप का  थोडा उजाला चाहिये
हाथ  में   सब  चाबिया  है  बन्द  ताला चाहिये
मैं आग हू मुझको भभकने  का मशाला चाहिये!!
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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