Friday, May 15, 2015

               ऋण कृत्वा,घृतम् पिवेत
क्या  मेरे   घर   में  परदेशी  अब  ठाठ  करेगे
लगता  है  हम  गरूड   पुराण  का  पाठ करेगे
हम  गीता , रामायण   की  भांषा  भूल  रहे है
कर्जा  खाकर   भीख   माँग  कर   फूल  रहे है

क्या भारत का चिन्तन मन्थन  भटक गया है
चाणक्य,विदुर  की   नीति नेता सटक गया है
दुश्मन   को   घर   में  ही   न्यौता  देने  वाले
ये  सभी   शिखण्डी और विभीषण हमने पाले

एक  कृष्ण  था   जिसने  ये   ब्रह्माण्ड बनाया
एक  राम  था  जो  लंका  को  छोड  के  आया
हरिश्चन्द्र   ने  स्वप्न  दोष  में सब कुछ छोडा
सतियों  ने  भी  काल - चक्र के भ्रम को तोडा

हम  भारत  के   कितने   टुकडे   काट चुके है
हर  टुकडे   को  जाति ,मजहब में बाँट चुके है
सोने  की  चिडिया  में   भी   मिटटी  के लाले
धर्म - धरा  में  भी  कलियुग  के खेल निराले

जापान, चीन  को  दर-दर   ठोकर  खाते देखा
क्या अमरीका  को  भीख  माँगकर गाते देखा
छोटे  -  मोटे    बहुत   देश   हैे   स्वाभिमानी
जिन   देशों   के   आगे  हम  भरते   हेै पानी

नैपाल, पाक  और  बंग्ला  चारों तरफ  है नंगे
हम  कई  दशकों  से   झेल  रहे  है इनके पंगे
इनकी  संगत  में  अब  हम  भी बने भिखारी
हर  बच्चा - बच्चा  कर्जे   में   डूबा   है  भारी

ये  डेढ  अरब  घर  के  हैं ,पहले इन्हे सभालो
तकनीकी  के  हर  विकाश  में  इनको   ढालो
भारत  का  हर  सपना  ये  ही साकार   करेंगे
अब ये  समाधान  है सारा सपना  पार  करेंगे

बिना  बात   के  कौन , किसे   कर्जा   देता है
जनता नंगी है, खुशहाल आज  केवल  नेता हेै
क्यो भीख मागने कीआदत   का  नशा चढा है
इस  धरती  में  कवि आग ,धन  बहुत पडा हैैे।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com  

No comments:

Post a Comment