Thursday, May 21, 2015

                          जागो
इस  राजनीति  के  तराजू  में  हमें  मत  ताेलिये
सम्मान देना  है अगर  तो  बस  कवि ही बोलिये
हम हृदय के  हादसों  की  हर  हदों  को  खोलते हैं
सत्यता  से  शब्द  को  निर्वस्त्र   करके  बोलते है

वास्तविकता भ्रष्टता की हम  तुम्हें  दिखला रहे हैं
हर छन्द में  हम बीहडों  के  डाकुओ को ला रहे हेैं
ये  सियासी  लेखनी   की  नोक  से  घबरा  रहे हैं
मेरा वतन जिन्दा रहे, हम गीत लिखते जा रहे हेेैं

ये  वतन, पैसा   हमारा,  किस तरह  से फूँकते हैं
जनमतो  की  भीख  से, मूँह पर  हमारे  थूकते हैं
इन डाकुओ  को आग से औकात में  मैं ला रहा हूँ
इसलिये  कर्कस ध्वनि के गीत  हरदम गा रहा हूँ

सोते  हुये  मुर्छित  नरो  को , मैं जगाता  जाउँगा
शब्द  में  लिपटा  हुआ, मैं  हर जहन में  आउँगा
कौशिस में  हूँ  कि  फिर  लगादूं आग  पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेगे  फिरका परस्ती भेष मे

बस, होलियाँ  जलती  रहें, प्रहलाद  बचने चाहिये
इस  देश  की  भटकी  जवानी   में  रवानी  लाइये
प्रतिकार को बस ठानलो खुलकर सडक पर आइये
इतिहास  की  इज्जत बचे, कुछ  गीत  ऐसे गाइये

सब   सियासी   राष्ट्र - हित नीलाम  करते  जायेंगे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  रोज मरते जायेंगे
कौमो,  कबीलों,  सम्प्रदायों   मे  हमे  ये  बाँटते हैं
इस  राष्ट्र को  ये केक  की भाँति सडक में काटते है

किसान  के  घर  बोरियां  थी, अब कनस्तर हेै नही
दो - वक्त  की  रोटी  गरीबों   को  मयस्सर  है  नही
खाद्यान्न  की  कीमत  हमे  बे-वक्त शूली  टाँगती हेै
अब  देश  की सत्ता सियासत वक्त हमसे  माँगती है

राष्ट्र  का उत्सव नही बस,अपना  मनाना  जानते है
लुट  रहा  है  धन  हमारा, ये भाँग अपनी  छानते हेै
इन  हरकतों  का  हर  तरफ  अवरोध  होना चाहिये
मैं  आग  हूँ, मुझ पर  भी  थोडा  शोघ होना चाहिये।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

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