मजबूरी
भ्रष्टता पर अब कलम का वार भी बेकार है
ये बे-हया सी राजनीति बेवफा बेधार है
कुछ पता चलता नही कब कौन सा नेता कंहा
कौन से दल से दबा है कौन दल देता पनाह
राजनेता की नजर सत्ता शिखर पर है गढी
वाशना के खेल में इस देश की किसको पढी
लक्ष्य दिल्ली को बनाकर राजनीति हो रही है
धृतराष्ट्र की औलाद देखो बीज कैसे बो रही है
हर जगह शकुनि के पासे चौपडों का खेल है
ये कौरवों की राजनीति मेल है बेमेल है
न्यायालयों में कृष्ण की गीता गुनाहों के लिये
हाथ भी रखता वही है कूकर्म जिसने भी किये
कैसे शपत लेतें है नेता राष्ट्र के उत्थान में
क्यों बदलती है धरा ये मजहबी शमशान में
फिर चुनावी जंग चौराहों में चढकर बोलती
राजनीति की हवस औकात सब की खोलती
वीरान है घर, हम विदेशी सैर में मदमस्त हैं
सब सियासी शब्द की जादूगरी में व्यस्त हैं
विश्व में इज्जत मिली है,ये सियासी बोलते हैं
चौराहे में अपने घरों की अस्मिता को खोलते है
सोचकर ही बोलता हूॅं ,अब कवि क्या गायेगा
मृत शवों के बीच से तो व्यंग ही अब आयेगा
श्रृंगार में और हास्य में तुकबन्द की बौछार है
मै आग हूँ, मेरी कलम में आज भी वो धार है
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
भ्रष्टता पर अब कलम का वार भी बेकार है
ये बे-हया सी राजनीति बेवफा बेधार है
कुछ पता चलता नही कब कौन सा नेता कंहा
कौन से दल से दबा है कौन दल देता पनाह
राजनेता की नजर सत्ता शिखर पर है गढी
वाशना के खेल में इस देश की किसको पढी
लक्ष्य दिल्ली को बनाकर राजनीति हो रही है
धृतराष्ट्र की औलाद देखो बीज कैसे बो रही है
हर जगह शकुनि के पासे चौपडों का खेल है
ये कौरवों की राजनीति मेल है बेमेल है
न्यायालयों में कृष्ण की गीता गुनाहों के लिये
हाथ भी रखता वही है कूकर्म जिसने भी किये
कैसे शपत लेतें है नेता राष्ट्र के उत्थान में
क्यों बदलती है धरा ये मजहबी शमशान में
फिर चुनावी जंग चौराहों में चढकर बोलती
राजनीति की हवस औकात सब की खोलती
वीरान है घर, हम विदेशी सैर में मदमस्त हैं
सब सियासी शब्द की जादूगरी में व्यस्त हैं
विश्व में इज्जत मिली है,ये सियासी बोलते हैं
चौराहे में अपने घरों की अस्मिता को खोलते है
सोचकर ही बोलता हूॅं ,अब कवि क्या गायेगा
मृत शवों के बीच से तो व्यंग ही अब आयेगा
श्रृंगार में और हास्य में तुकबन्द की बौछार है
मै आग हूँ, मेरी कलम में आज भी वो धार है
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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