वर्ष में-अर्स या फर्स
दागी,बागी और अनुरागी, राजनीति की हरियाली है
नेता प्रजातन्त्र के जीजा, हम जनता इनकी शाली हेैं
डाकू, चोर, उचक्के, कतली ही तो भारत चला रहे हैं
लोकतन्त्र में बोट - बैक की होली नेता जला रहे हैं
चुनने से पहले के भाषण सुनकर जनता शर्माती है
नेताओं को याद दिलाओ, इनको शर्म नही आती हैेे
केवल कुर्सि को हथियाना, राजनीति का ही फण्डा है
शब्दजाल से जनता को बेवकूफ बनाना हथकण्डा है
महाकष्ट है पढी,लिखी जनता भी पागल बन जाती है
असमजस होता है,जनता क्या कुडा करकट खाती है
पशू,पक्षी भयभीत पथों पर, जाने से भी घबराते हैं
जानवरों से बद्तर हम है,बार-बार पथ दोहराते है
मुजरिम की है जगह जेल में उनको सत्ता पाल रही है
अपराधी की प्रतिभाओं में भारत को खंगाल रही है
मुझे बताओ,अब किस मूह से तुमको बुद्विमान कहू मैं
छल,कपटी वाणीभूषण को असली हिन्दुस्तान कहू मै
ये झूठे नेता हटे देश से ,अब क्या कोई कानून बनेगा
लाल बहादुर जैसी प्रतिभाओ के तन का खून बनेगा
छल,बल,कपटी,मक्कारों के नेता को कितना ढोओगे
हे प्रजातन्त्र की मुर्दा लाशों,कब तक जनमत से रोओगे
काले - धन की आशा-तृष्णा,हर खाते को झेल रही है
लावारिस का बीमा, जन-धन,घर-घर सत्ता खेल रही है
ये चमत्कार है,शब्दो से ही नेता हमको पाल रहे है
हम सब कुर्बानी के बकरे, गले में छूरी डाल रहे है
मंहगायी बढती जाती है, सीमा के झगडे जारी है
जिनको दोस्त बनाकर आये, खेल रहे सब गद्दारी है
अन्नदाता के विक्षत शव पर,कफन षब्द से पहनाते है
कवि आग की हिम्मत देखो,इन पर भी कविता गाते है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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