Monday, May 18, 2015

             मॅंहगायी और धर्म का आतंक
हर  चैनल  को  मंहगायी की चिन्ता चिता संताती है
हे  शब्दों  के  सौदागर   ढॅूंढों ,  ये   कहाॅं   से आती है
अपने - अपने  पुरातत्व  के अनुभव  हमें सुनाते हो
राजनीति   का   दोषारोपण,  मंहगायी   से  गाते हो

अर्थ-व्यवस्था,फेल  हो  गयी गुण्डगर्दी खेल हो गयी
मघ्य-वर्ग में जीने  वालों ये तिहाड़ की जेल हो गयी
धन-वैभव के  सारे  कैदी मस्त हवा  में  घूम  रहे हैं
राज- काज में देख सियासी , खादी कुर्ते  झूम रहे हैं

ये मॅंहगायी  व्यवसायी ,उद्योगपति को, पाल रही है
कालेधन के चोर उचक्के ,शदियों  से  संभाल रही है
मॅंहगायी का कारण  क्या  है, सारे नेता  जान रहे हैं
हर चैनल में  जान - बूझकर, कैसे सीना तान रहे हैं

लोकतंत्र के मुर्दे जब तक  जनता से चुनकर आयेंगे
जन-मानस  में प्रजातन्त्र के, भूत हमेसा लहरायेगें
सभी  तिहाड़ी  अन्दर  बैठे   मस्ती पूरी  काट रहे हैं
आज  मीडिया चोरों  में  भी नौ -रत्नो को छाॅंट रहे हैं

आज  गेरूवे  काले-धन  को प्रमाणित करते जाते हैं
नेता के,उद्योगपति  के मठ,मन्दिर  से  क्या नाते हैं
खरबों की इस धनमाया में सन्यासी की अय्यासी है
मॅंहगायी  में  बरकत  देखो ये  कैसा  भारत वाशी है

सत्याग्रह  में  चंदा  देखो , बाबा   जी का धन्धा देखो
योग-भोग  में  जीने वाला,असमंजस में अन्धा देखो
देख सियासी सत्याग्रह में विस्फोटक सामान पडा है
लाल वस्त्र के  सन्यासी पर,माया का परवान चढा है

खरपतवारें  लोकतंत्र  की  खेती में खुद उग जाती हैं
राष्ट्र -द्रोह की फसलें भारत में शदियों से लहराती हैं
अज्ञानी  गुरूओं का गौरव  भारत माता को खाता है
अधकचरे चिन्तन से तो ये राष्ट्र हमेशा चिल्लाता है

देश का  नेता परदेशों में,जनता का धन लुटा रहा है
मंगोल  ने  देश को लूटा, फिर से उनको जुटा रहा है
भ्रष्टाचारी   जनता  भ्रष्टाचार  प्यार  से  पाल  रही है
व्यभिचार की  पुष्टि  में   भी  अहंकार खंगाल रही है

सत्य सतत् तीखा होता है,लिखने में भी दोष नही है
इन भावों  में  कष्ट  भरा  है,शब्दों का उदघोष नही है
भ्रष्ट व्यवस्था  अपने  हाथों से  हमने  पाली-पोशी है
कवि आग  हम  जैसे  मुर्दे  भ्रष्ट व्यवस्था के दोषी हैं।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो0 9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

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