Saturday, May 23, 2015

                 तीसरा मोर्चा
टेढी - मेढी   बुनियादों   पर   भवन  खडा हेै
राजनीति   में  लावारिस   भी   एक  धडा है
ये  हारे   थके  सिपाही   धन्धा   ढूॅढ   रहे है
सब लूले , लंगडे़,  काणे   बन्दा   ढूॅढ  रहे है

वाह  रे, प्रजातन्त्र   तेरी भी माया  है न्यारी
हम   भूखे - नंगे  पाल  रहे   हैं   खद्दर-धारी
बीहड़   के   डाकू   संसद  की   शान   बढायें
अब  राष्ट्र - गीत  भी  राष्ट्र  लूटने  वाले गायें

थर्ड  - मोरचा   बनने    की    भी   तैयारी है
जनमत   में   ये    सारे   खंजर, दो  धारी हैं
गाली  दे - देकर   भी   सत्ता,  खंगाल  रहे हैं
सपनो   के   गमले   में   बरगद  पाल रहे हैं

पहले   भी  तो   थर्ड  -  फ्रन्ट   स्टंट  बने थे
जनमत  की  धरती   में, खरपतवार  घने थे
स.पा.,बा.स.पा, सी.पी.एम. और सी.पी.आइ
ममता, समता  ने  भी  अपनी  टाॅंग  अडायी

अब  नितीश, और  लालू   दोनो  एक  धडे हेै
सांप,   नेवले     देखो   दोनो   साथ   खडे हेै
हिन्दू ,  मुस्लिम,   अगडे,  पिछडे   ठेकेदारी
अब  ढूंढ  रही  है   चारा    देखो   गाय दुधारी

पूरब, पश्चिम  , उत्तर,   दक्षिण  के  लावारिस
वो  भी  बनना  चाहते  हैं   नाजायज  वारिस
तैयारी   में    बाबा    और  अन्ना   के   चेले
अब  नीम , गिलोइ  के  उपर  भी  चढे़ करेले

ये  सब चौराहों  के  लावारिस   भी  तैयारी में
गाजर  घासें  प्रजातन्त्र   की   इस  क्यारी में
जनमत  की  पूॅंजी  को  ये   मिलकर  खायेंगे
संसद   में   धोती   और    लंगोटे   लहरायेगें

नये  भानूमति  के  कुडमें के  ये प्रतिनीधी हैं
सत्ता  कब्जाने  की   इनकी  बस एक विधी है
क्या  लेना   इनको,  जनता   भाड़   में  जाय
अब  ये  संसद है , प्रजातन्त्र  का  एक सराॅंय

ये माया - धारी  सब  मोदी  के  साथ  खडे हैं
अब  भीड  जुटाने  वाले  डमरू  बहुत  बडे है
वब्रूवाहन  और  घटोत्कक्ष  के अलग  रूप हैं
अब बी. जे. पी. में बडे-बडे महा अन्ध कूप हैं

द्रोण,  भीष्म  और  कृपाचार्य  जैसे बरगद हैं
रण  में  कूदेंगे  चाहे  मोदी  ने  काटा  कद हैं
सतपाल, बीरेन्दर, बने विभीषण भी आयेंगें
स्तूति  गान  अब  शकुनि   मोदी  के गायेंगें

मोदी शब्दों का सौदागर है, क्या सहन करोगे
थर्ड  मोरचे   की  लंका,  फिर   दहन  करोगे
कुछ  साल  चुप  बैठो   तेल  की   धारें देखो
बची, खुची  ताकत  को  सडकों पर ना फेंको

तुम सबके नाटक जनता पहले झेल चुकी है
लूले,  लंगडो   के   खेलो  को  खेल  चुकी हेै
इस लावारिस जनमत को अब ना भडकाओ
कवि आग कहता  है  मिलकर शोक मनाओ।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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