Sunday, March 1, 2015

                 हिरासत मे सियासत
ये हिन्दू,मुस्लिम   होली  है, ये  जनमत होला
देख   रहे   हो  राजनीति   ने,  क्या  रंग घोला
सत्ता   की   पिचकारी  में   सब   घुल  जाता है
सब  चढा  रंग  भी   धीरे -  धीरे   धुल जाता हेै

हम मूरख  है  जो हिन्दू, मुस्लिम  चिल्लाते हेैं
ये   सारे नेता   इसी    बात    की   ही खाते हेैं
लंच,  मंच,   प्रंपच    सियासत    में   जारी है
अब   भी  जनता  हल्की   है,  नेता  ही भारी है

मुक्ति मुहम्मद   आज   पडोसी   पर जिन्दा हेै
जहन  में  अब भी  भारत  की   पूरी  निन्दा है
ये  जिसका    खातें   है,  उसको   ही  गुर्रातें है
अब चाल, चरित्र, चेहरों  के   ये   कैसे  नाते है

शदियों   से   हम  पेट  काट   कर पाल  रहे हैं
हम अपना भोजन  इनके  मूँह  में  डाल रहे हैं
उस भरी  सभा  में   देखो , कैसा  जूता  मारा
किस मूँह  से  ये कहते  हैं  हिन्दुस्तान हमारा

भारत  माँ   के  पुत्र   वंही    पर  जमे  हुये थे
अब  सत्ता   कैसे   हाथ  में आये  रमे  हुये थे
र्निलज्ज हजूरी से अच्छा  है  अलग ही रहना
अलगाव वाद  भारत में  अब  कितना सहना

अब खाना,पीना, लेना, देना  सब  कुछ  मेरा
पाकिस्तानी  आतंक - वाद  का  बना  है डेरा
हुर्रियत और  अलगाव - वाद  का  रैन-बसेरा
खुली  आँख  से  देख  रहे हैं,  फिर  मूंह फेरा

कुछ  भारत  मां  के पुत्र  मुझे अब गाली देंगे
झक्की,  पागल,  कांग्रेस  का  पिट्ठू   कहेंगे
उस  मार - काट   को  मेरी  दृष्टि  देख रही है
आज  सियासत जिस  पर  रोटी  सेंक रही है

तुमने  आजादी  से  लेकर  अब  क्या देखा है
इन्होने  हरदम  कीचड  और  पत्थर  फेंका है
ये काठ  की  हण्डी देखो कितना  और चलेगी
कवि आग , ये  दाल  सियासी   नही  गलेगी।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                   मो09897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

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