आदर्श का उपहास
भ्रष्टाचारी और व्यभिचारी जीवन के जज्बात नही हेैं
महापुरूषों का गौरव गाना, अपनी तो ओकात नही हेेैं
जो मरे राष्ट्र के खातिर, उनकी लाशों से हम खेल रहे हेै
चन्द्रशेखर,सूभाष,भगत सिंह मरकर हमको झेल रहे हेै
हम जैसे मुर्दो की पुष्पों की माला से वो ढक जाते हेै
फिर भी कुछ ना कुछ पत्थर वो बुनियादों में रख जाते हेै
राजनीति से वो बुनियादें हम सब मिलकर खोद रहे हैं
उस हरी भरी धरती को नेता अपने हल से जोत रहे हैं
सभी सियासी अपनी-अपनी फसलें उसमें लगा रहे हैं
भाग्य राष्ट्र का हंस भेष में आज काग ही जगा रहे हैं
शेरों की गाथाएं गीदड, अपने ढंग से गा जाते हेै
आजादी के बाद देश में अब शहीद भी शर्माते हेै
उनके भाव - भंगिमा, जज्बा केवल पुस्तक ही ढोती है
भारत-माता दुश्मन से कम, अपनो से ज्यादा रोती है
फिल्मी दुनिया गीत शहीदों के अपनी धुन में गाती हेै
राष्ट्र - भक्ति तो राष्ट्र सर्मपण के भावों से ही आती है
राष्ट्र - भक्त को अपने-अपने क्षेत्र , जाति में बाँट रहे हैं
हम शहीद की लाश सियासी , हानि-लाभ से चाट रहे हेैं
जो मरे देश के खातिर, अब वो सीमा से पट जाते हेै
बसे हुये थे हर दिल में,अब जिले,प्रान्त में बँट जाते हेै
भगत सिंह पंजाबी, बल्लभ अब गुजराती हो जाता हेै
सूभाषचन्द्र की महिमा केवल अब बंगाली ही गाता है
हर शहीद को चौरहों पर,अब कब तक कितना गाढोगे
धूल फाँकती प्रतिमाओं के कफन कंहा कितने फाडोगे
राजनीति को छोडो, दिल से नमन करो उन वीरों को
जाति मजहब के कंकड में भी ढूँढो फिर से हीरो को
श्रद्वा की अंजलि समर्पित भावों से गुणगान करे
राष्ट्र - भक्ति के कवि आग के छन्दों में हो घाव हरे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
भ्रष्टाचारी और व्यभिचारी जीवन के जज्बात नही हेैं
महापुरूषों का गौरव गाना, अपनी तो ओकात नही हेेैं
जो मरे राष्ट्र के खातिर, उनकी लाशों से हम खेल रहे हेै
चन्द्रशेखर,सूभाष,भगत सिंह मरकर हमको झेल रहे हेै
हम जैसे मुर्दो की पुष्पों की माला से वो ढक जाते हेै
फिर भी कुछ ना कुछ पत्थर वो बुनियादों में रख जाते हेै
राजनीति से वो बुनियादें हम सब मिलकर खोद रहे हैं
उस हरी भरी धरती को नेता अपने हल से जोत रहे हैं
सभी सियासी अपनी-अपनी फसलें उसमें लगा रहे हैं
भाग्य राष्ट्र का हंस भेष में आज काग ही जगा रहे हैं
शेरों की गाथाएं गीदड, अपने ढंग से गा जाते हेै
आजादी के बाद देश में अब शहीद भी शर्माते हेै
उनके भाव - भंगिमा, जज्बा केवल पुस्तक ही ढोती है
भारत-माता दुश्मन से कम, अपनो से ज्यादा रोती है
फिल्मी दुनिया गीत शहीदों के अपनी धुन में गाती हेै
राष्ट्र - भक्ति तो राष्ट्र सर्मपण के भावों से ही आती है
राष्ट्र - भक्त को अपने-अपने क्षेत्र , जाति में बाँट रहे हैं
हम शहीद की लाश सियासी , हानि-लाभ से चाट रहे हेैं
जो मरे देश के खातिर, अब वो सीमा से पट जाते हेै
बसे हुये थे हर दिल में,अब जिले,प्रान्त में बँट जाते हेै
भगत सिंह पंजाबी, बल्लभ अब गुजराती हो जाता हेै
सूभाषचन्द्र की महिमा केवल अब बंगाली ही गाता है
हर शहीद को चौरहों पर,अब कब तक कितना गाढोगे
धूल फाँकती प्रतिमाओं के कफन कंहा कितने फाडोगे
राजनीति को छोडो, दिल से नमन करो उन वीरों को
जाति मजहब के कंकड में भी ढूँढो फिर से हीरो को
श्रद्वा की अंजलि समर्पित भावों से गुणगान करे
राष्ट्र - भक्ति के कवि आग के छन्दों में हो घाव हरे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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