फिल्म का इल्म
फिल्म भी अब नग्न नारी के बिना बनती नही है
फिल्म के बिन दर्शकों मे वाशना जगती नही है
फिल्म में अश्लीलता आदर्श बनती जा रही हेै
फिल्म ही अंकुर धरा में नग्नता से खा रही है
आतंक के ये नये तरीके फिल्म से ही मिल रहे है
पुष्प भी व्यभिचार के फिल्म से ही खिल रहे है
राजनीति फिल्म के कुछ नये नमूने पालती है
राष्ट्र के मन्दिर सदन को, हालीवुड में ढालती है
अश्लीलता के हम पुजारी हो गये हैं देश में
अश्लीलता सब देखते हैं, हों किसी भी भेष में
फिल्म का अश्लीलता के बिन मजा आता नही
जो पुत्र करता है, तो वो भी बाप को भाता नही
नालियों में फिल्म की ,संस्कार बहते जा रहे हेै
आचरण भी फिल्म के सत्कार सहते जा रहे हेै
हम भी बच्चों में उसी किरदार को ही झांकते हैं
राष्ट्र की नई पीढीयों को किस तरह से हांकते हैं
विज्ञापनो की नग्नता को सद् गृहस्थी झेलते हेैं
पुष्प जो विकसित हुये हैं,किस दिशा मे खेलते हैं
मजबूर हैं मां-बाप भी इस वाशना के खेल में
स्वातन्त्रता की हर गृहस्थी पल रही है जेल में
संस्कार के आदर्श की कुछ फिल्म बननी चाहिये
शास्त्र - सम्मत वाशना हो, इल्म बननी चाहिये
आने वाली नश्ल में ,विस्फोट को मैं देखता हूँ
मै आग हूँ चिन्गारियाँ,बस शब्द से ही फेंकता हूँ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
फिल्म भी अब नग्न नारी के बिना बनती नही है
फिल्म के बिन दर्शकों मे वाशना जगती नही है
फिल्म में अश्लीलता आदर्श बनती जा रही हेै
फिल्म ही अंकुर धरा में नग्नता से खा रही है
आतंक के ये नये तरीके फिल्म से ही मिल रहे है
पुष्प भी व्यभिचार के फिल्म से ही खिल रहे है
राजनीति फिल्म के कुछ नये नमूने पालती है
राष्ट्र के मन्दिर सदन को, हालीवुड में ढालती है
अश्लीलता के हम पुजारी हो गये हैं देश में
अश्लीलता सब देखते हैं, हों किसी भी भेष में
फिल्म का अश्लीलता के बिन मजा आता नही
जो पुत्र करता है, तो वो भी बाप को भाता नही
नालियों में फिल्म की ,संस्कार बहते जा रहे हेै
आचरण भी फिल्म के सत्कार सहते जा रहे हेै
हम भी बच्चों में उसी किरदार को ही झांकते हैं
राष्ट्र की नई पीढीयों को किस तरह से हांकते हैं
विज्ञापनो की नग्नता को सद् गृहस्थी झेलते हेैं
पुष्प जो विकसित हुये हैं,किस दिशा मे खेलते हैं
मजबूर हैं मां-बाप भी इस वाशना के खेल में
स्वातन्त्रता की हर गृहस्थी पल रही है जेल में
संस्कार के आदर्श की कुछ फिल्म बननी चाहिये
शास्त्र - सम्मत वाशना हो, इल्म बननी चाहिये
आने वाली नश्ल में ,विस्फोट को मैं देखता हूँ
मै आग हूँ चिन्गारियाँ,बस शब्द से ही फेंकता हूँ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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