Monday, March 16, 2015

                   फिल्म का इल्म
फिल्म भी अब नग्न नारी  के बिना बनती नही है
फिल्म  के  बिन दर्शकों  मे  वाशना जगती नही है
फिल्म  में  अश्लीलता  आदर्श   बनती  जा  रही हेै
फिल्म  ही  अंकुर  धरा  में   नग्नता से खा रही है

आतंक के ये नये तरीके  फिल्म से ही मिल रहे है
पुष्प भी  व्यभिचार के  फिल्म  से ही खिल रहे है
राजनीति फिल्म  के  कुछ  नये  नमूने पालती है
राष्ट्र  के मन्दिर सदन  को, हालीवुड  में ढालती है

अश्लीलता  के   हम   पुजारी   हो  गये  हैं  देश में
अश्लीलता  सब  देखते  हैं, हों  किसी  भी  भेष में
फिल्म का  अश्लीलता  के  बिन  मजा आता नही
जो पुत्र  करता  है, तो वो भी बाप  को भाता नही

नालियों  में  फिल्म की ,संस्कार  बहते जा रहे हेै
आचरण  भी  फिल्म के सत्कार  सहते जा रहे हेै
हम भी बच्चों में उसी  किरदार को  ही झांकते हैं
राष्ट्र की नई पीढीयों को  किस  तरह  से हांकते हैं

विज्ञापनो की नग्नता  को  सद् गृहस्थी झेलते हेैं
पुष्प जो विकसित हुये हैं,किस दिशा मे खेलते हैं
मजबूर हैं  मां-बाप  भी  इस  वाशना  के खेल में
स्वातन्त्रता की  हर गृहस्थी   पल रही  है जेल में

संस्कार के आदर्श की कुछ  फिल्म बननी चाहिये
शास्त्र - सम्मत  वाशना  हो, इल्म  बननी चाहिये
आने वाली  नश्ल  में ,विस्फोट  को   मैं  देखता हूँ
मै आग हूँ चिन्गारियाँ,बस  शब्द से ही फेंकता हूँ।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
              मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

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