Tuesday, March 10, 2015

                आम का झण्डूबाम
भानूमति  का  कुडमा  अब तो आम होगया
अब झाडू  और  जुगाडू   ये   पैगाम हो गया
बुनियादों  के  पत्थर  खुद  ही खिसक रहे हैं
खास  आदमी ,आम  बने अब सिसक रहे हेैं

दूर दृष्टि  और  अल्प  दृष्टि   में  जंग छिडी है
बछडा, बछडी  साण्डो  से  भी  खूब  भिडी है
भगवन्त मान कामेडी  सर्कस  सिखा रहा हैं
तरकस, तीर,   धनुष  केजरी   दिखा  रहा हेैं

सब  हल्के-हल्के  शब्द  बाण  से दाग  रहे हैं
बुद्वि - बल्लभ   शान्त  छिपे  है  भाग  रहे हैं
संजय और विस्वास  शिखण्डी  घात लगाये
अब  आशूतोष  भी  दबे  सुरों  से  गाना गाये

सियार,शशक  अब  शेरों को  भी  तोल रहे हैं
गाधी मंयक पंक, राजा  रंको  में  घोल रहे हैं
बे - लगाम   शब्दो   से  चैनल   खेल  रहा है
भानूमति  का  कूडमा,   दिल्ली  झेल  रहा है

ये  हाइब्रीड  के   पौधे  जल्दी    खडे   हो गये
माकूल मिला  मौसम तो जल्दी  बडे  हो गये
स्वस्थ बीज की फसल,समय पर  लहराती हेै
नंगो   के   सासन   से तो भत्  पिट  जाती है

चौराहे  पर  बूढे  बाप   को   छोड   कर  भागे
हम  सोच  रहे  थे  भारत  मे बस ,ये ही जागे
ये  ऐसे  जागे , अब  सारे  पागल  झूम रहे है
क्यों सत्ता   में  विक्षिप्त   सियासी  घूम रहे है

बन्दर  के  हाथों  में  चाकू  अब  खतरनाक हैे
ना समझी  का सासन  समझो  हुआ खाक है
सत्ता  और  सियासत   अनुभव  से  चलती है
ये हल्कापन और  अहंकार,  लालच गलती है

घिसपिट कर आये जो जमीन  से,फेल होगये
इस प्रजातन्त्र में जनमत के सब खेल हो गये
झूठे  अहंकार ,  सिद्यान्त   हमेशा  टकराते हैं
औकात सभी की कवि  आग  खुलकर गाते हैं।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                    मो0 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

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