खेल में नकेल
डेढ अरब की जनसंख्या में ग्यारह ढंग से ढूंढे होते
हे नालायक क्रिकेट गुरूओ, चेले ढंग से मूँडे होते
अंग्रेजी दुनिया के तोतों, गली मुहल्लो में भी झाँको
प्रतिभाएं सब दबी पडी हैं उनकी कीमत को भी आँको
लगान फिल्म देखी हेैे तुमने उससे भी अनुमान लगाते
जिनके तन में कुछ ताकत हो,उनसे ही अभ्यास कराते
विज्ञापन के इन कीडो में राष्ट्र- भक्ति को झाँक रहे हो
अब अंग्रेजी संस्कारो में ,भारत माता आँक रहे हो
अच्छी-अच्छी प्रतिभाओं को राजनीति से मरते देखा
चयन पक्ष को प्रतिभाओं से गुण्डागर्दी करते देखा
सट्टा,जूँआ,अय्यासी अब इस खेल में आम हो गया
सब खेलों के उपर क्रिकेट भारत का पैगाम हो गया
क्रिकेट में अब सुन्दर नारी आँख मिचोली की क्रिडा हेै
अय्यासी के इस खेल में काम - वाशना ही पीडा हेै
काम - कला की माहिर नारी इन पर डोरे डाल रही हेै
इस खेल को प्रतिभाएं कम, अय्यासी ही पाल रही है
कुस्ती और कबड्डी, गिल्ली ,डण्डे में येे बात नही है
इन खेलों में प्रतिभाओं के आवारा जज्बात नही है
समय बद्व निर्णायक खेलों की तो अब औकात नही है
क्रिकेट से उँची ,खेलों की अब भारत में जात नही हेै
एक माह से आधा भारत काम छोड कर जाग रहा था
मन्दिर,मस्जिद,गुरूद्वारे में सारी मन्नत माँग रहा था
पूजा, पाठ, हवन, यज्ञ सब, हाव-भाव बेकार हो गये
भारत ने जो सपने देखे,पल भर मे सब तार हो गये
हर चैनल में पुरातत्व के टूटे - फूटे दिख जाते हैं
उनका कोई काम नही है, क्रिकेट का गाना गाते हैं
अरब-खरब की माया अन्दर, बूढे अब भी कमा रहे हैं
अब जिन्दे सब बेकार हो गये, मुर्दे भारत जगा रहे हैं
इस खेल से देश की इज्जत मिट्टी में क्यों मिलती है
भगवानों की बुनियादें भी इसी खेल से क्यों हिलती है
खेलों को बस खेल समझकर खेलो तो कोई हर्ज नही है
कवि आग क्रिकेट की दुनिया भारत में खुदगर्ज नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
डेढ अरब की जनसंख्या में ग्यारह ढंग से ढूंढे होते
हे नालायक क्रिकेट गुरूओ, चेले ढंग से मूँडे होते
अंग्रेजी दुनिया के तोतों, गली मुहल्लो में भी झाँको
प्रतिभाएं सब दबी पडी हैं उनकी कीमत को भी आँको
लगान फिल्म देखी हेैे तुमने उससे भी अनुमान लगाते
जिनके तन में कुछ ताकत हो,उनसे ही अभ्यास कराते
विज्ञापन के इन कीडो में राष्ट्र- भक्ति को झाँक रहे हो
अब अंग्रेजी संस्कारो में ,भारत माता आँक रहे हो
अच्छी-अच्छी प्रतिभाओं को राजनीति से मरते देखा
चयन पक्ष को प्रतिभाओं से गुण्डागर्दी करते देखा
सट्टा,जूँआ,अय्यासी अब इस खेल में आम हो गया
सब खेलों के उपर क्रिकेट भारत का पैगाम हो गया
क्रिकेट में अब सुन्दर नारी आँख मिचोली की क्रिडा हेै
अय्यासी के इस खेल में काम - वाशना ही पीडा हेै
काम - कला की माहिर नारी इन पर डोरे डाल रही हेै
इस खेल को प्रतिभाएं कम, अय्यासी ही पाल रही है
कुस्ती और कबड्डी, गिल्ली ,डण्डे में येे बात नही है
इन खेलों में प्रतिभाओं के आवारा जज्बात नही है
समय बद्व निर्णायक खेलों की तो अब औकात नही है
क्रिकेट से उँची ,खेलों की अब भारत में जात नही हेै
एक माह से आधा भारत काम छोड कर जाग रहा था
मन्दिर,मस्जिद,गुरूद्वारे में सारी मन्नत माँग रहा था
पूजा, पाठ, हवन, यज्ञ सब, हाव-भाव बेकार हो गये
भारत ने जो सपने देखे,पल भर मे सब तार हो गये
हर चैनल में पुरातत्व के टूटे - फूटे दिख जाते हैं
उनका कोई काम नही है, क्रिकेट का गाना गाते हैं
अरब-खरब की माया अन्दर, बूढे अब भी कमा रहे हैं
अब जिन्दे सब बेकार हो गये, मुर्दे भारत जगा रहे हैं
इस खेल से देश की इज्जत मिट्टी में क्यों मिलती है
भगवानों की बुनियादें भी इसी खेल से क्यों हिलती है
खेलों को बस खेल समझकर खेलो तो कोई हर्ज नही है
कवि आग क्रिकेट की दुनिया भारत में खुदगर्ज नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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