Saturday, March 28, 2015

               ज्वाला में बाला
राम  नवमी   आज    है,  पर  रावणों  का राज है
जिन  सिरों   पर  ताज है,ये उन सिरों की खाज है
सीता  यहां   मोहताज  है,  सूपर्णखां   पर नाज है
ये राजनीति  आज  है, बस,  धर्म  का  अन्दाज है

टूटती   हैं   डालियाँ,   फिर   फूटती   हैं  थालियाँ
बज   रही   हैं   बालियां,  अब  छूटती  हैं लालियां
कट  रही  हरियालियां, बस, बँट  रही  हैं नालियाँ
गूंजती  हैं  गालियाँ  क्यों,  बज   रही  हैं तालियाँ

पूजती  कन्या   घरों   में,  भ्रूण  हत्या  हो  रही है
देखकर इन  बालिका  को, आज   दुर्गा  रो रही है
आडम्बरों  से  दूर  हो,मां   के  प्रणय  को जानिये
ऱाष्ट्र  की  इन  पुत्रीयों  को  भी  तो  चण्डी मानिये

बलात्कारी  भी  यंहा   पर   देवियों   को  पूजते हैं
व्यभिचार भी देखो धर्म से किस तरह से जूझते हैं
आध्यात्म  भी बदनाम है क्यों,वाशना के खेल में
क्यों  कष्ट  में  अबला  पडी है,धर्म की इस जेल में

प्रण  करें  सब  बालिकायें, तन ढकें  सब  लाज से
अंग की  ये  नंग  छवियां,ना दिखे  फिर  आज से
संकल्प में हो,हर युवक अश्लील  के  इस  काज से
अब देवता  बनकर दिखें, सब  देव  के अन्दाज से।।
          राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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