दुर्गा-स्तुति
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
षडयन्त्रो से फौज मरी है,जा माँ जीवन जोत जगादे
सब राजनीति तू देख रही हैे चोर-चोर मौसेरे भाई
बे-गुनाहो ने तो अब तक इनके कारण जान गवाँयी
ऐसी कूटनीति भारत की,माँ इस पर तू आग लगादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
सत्ता के कारण माँ देखो,दुश्मन के भी गले लगे हैं
भाषण सुनकर समझे थे,अब भारत के भाग्य जगे हैं
चौबीस घण्टे के भीतर ही जहर दिल का बाहर आया
मेरे घर की रोटी खाकर, पाकिस्तानी फतवा गाया
कुछ तो ऐसा करदे मैय्या, इनको सरहद पार भगादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
अरब-खरब की बाढ त्रासदी, ये भारत ही झेल रहा हेै
बे-शर्मी और हिम्मत देखो, आतंको से खेल रहा है
रामनाम की माला जपकर मौन हुये हम देख रहे है
ये अल्लाह के गन्दे, बन्दे अपनी रोटी सेंक रहे हेै
बहुत होगया माँचामुण्डा इनको अब औकात दिखादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
पाकस्तिानी कुछ औलादें, मेरा घर भी पाल रहा हेै
राष्ट्र-द्रोह को फुसला करके राष्ट्र-भक्ति में ढाल रहा है
इन सर्पों को दूध पिलाकर नाग -पंचमी मना रहा हेै
चिडियाघर के आतंको से अपनी इज्जत बना रहा है
हे रणचण्डी,नर-मुण्डो की कण्ठी - माला पुनःसजादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
माओ-वादी, नक्सल-वादी हा-हा कार मचाकर घूमें
शान्तीदूत बने नेता जी,नतमस्तक,मस्तक को चूमे
बलात्कार और व्यभिचारों के चैराहो पर हाट लगे हैं
राजनीति की भांषा देखो, सभी पराये यही सगे है
कविआग की विनती सुनले,वो रणभेरी फिर से गादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
षडयन्त्रो से फौज मरी है,जा माँ जीवन जोत जगादे
सब राजनीति तू देख रही हैे चोर-चोर मौसेरे भाई
बे-गुनाहो ने तो अब तक इनके कारण जान गवाँयी
ऐसी कूटनीति भारत की,माँ इस पर तू आग लगादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
सत्ता के कारण माँ देखो,दुश्मन के भी गले लगे हैं
भाषण सुनकर समझे थे,अब भारत के भाग्य जगे हैं
चौबीस घण्टे के भीतर ही जहर दिल का बाहर आया
मेरे घर की रोटी खाकर, पाकिस्तानी फतवा गाया
कुछ तो ऐसा करदे मैय्या, इनको सरहद पार भगादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
अरब-खरब की बाढ त्रासदी, ये भारत ही झेल रहा हेै
बे-शर्मी और हिम्मत देखो, आतंको से खेल रहा है
रामनाम की माला जपकर मौन हुये हम देख रहे है
ये अल्लाह के गन्दे, बन्दे अपनी रोटी सेंक रहे हेै
बहुत होगया माँचामुण्डा इनको अब औकात दिखादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
पाकस्तिानी कुछ औलादें, मेरा घर भी पाल रहा हेै
राष्ट्र-द्रोह को फुसला करके राष्ट्र-भक्ति में ढाल रहा है
इन सर्पों को दूध पिलाकर नाग -पंचमी मना रहा हेै
चिडियाघर के आतंको से अपनी इज्जत बना रहा है
हे रणचण्डी,नर-मुण्डो की कण्ठी - माला पुनःसजादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
माओ-वादी, नक्सल-वादी हा-हा कार मचाकर घूमें
शान्तीदूत बने नेता जी,नतमस्तक,मस्तक को चूमे
बलात्कार और व्यभिचारों के चैराहो पर हाट लगे हैं
राजनीति की भांषा देखो, सभी पराये यही सगे है
कविआग की विनती सुनले,वो रणभेरी फिर से गादे
हे माँ दुर्गा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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