हमारी हिन्दी की पुस्तकों में प्रार्थनाएं होती हैं,जिनका आशय देश की समृध्दि,व सम्मान था,परन्तु आज मुझे लगता है कि वे प्रार्थनाएं,हमारे कृत्यों से निष्फल सी हो गयी हैं।इसी वेदना से ग्रसित होकर एक प्रर्थना आज के समयानूकूल लिख रहा हूं,पाठकों से निवेदन है कि इस प्रार्थना को पाठ्यक्रम में लगवाने का प्रयास करें।
वतन पर कफन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
इस तरह से तू ना अपने प्यार का इजहार कर
सरहदों के हर शहीदों के लिये मुमकिन तो है
पर वतन के लूटने वालों का ना श्रृंगार कर
अस्मिता मेरे वतन की क्यों धरा में है दफन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
राम के और कृष्ण के उपदेश को सबने सुना
बुद्व और महावीर का हर वाकिया सबनेे गुना
गुरूग्रंथ के ईसा के लब्जों को भी गीता में पढा
र्दुभाग्य है ये देश क्यों बन गया मजहब धडा
मीरा कबीरा के भजन से होगया था गुल चमन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
जो मजहब और जातियों में बांटते हैं ये धरा
हिंदू,मुश्लिम ,सिक्ख, ईसाइ के बने हैं रहनुमा
खुद लिपट कर खादियों में वादियों में मस्त हैं
मेरे वतन की आबरु ,बे -आबरु में अस्त है
देवताओं की धरा को आज हम करते दमन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
स्वर्ण-पक्षी था कभी यह देश ,क्यों बेहाल है
मरघटों की राजनीति क्यों यंहा महाकाल है
बगुले दरिंदों से यंहा पर हंस बनकर घूमते
रोंदते हैं क्यों धरा , मद के नशे में झूमते
हो रहा है राष्ट्र के सम्मान का कैसा हवन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
आड में तेरी सियासी लूटकर सब खा गये
मुल्क के, मजहब लूटेरे सल्तनत में छा गये
हर तरह की भ्रष्टता अब राजनीति हो गयी
व्यभिचार से तेरी तिरंगे अस्मिता भी खो गयी
कौन करता है तूझे इस देश में दिल से नमन
ऐ मेरे अहले चमन ,ऐ मेरे कौमी कफन
हम पडोसी मुल्क की हरकत सरहद पर सह रहे
आतंक की हर बाढ में भी हम हमेशा बह रहे
नेता हमारे देश के, बस कूटनीति चल रहे हैं
सम्मान से घुसपैंठिये आधे वतन में पल रहे हैं
आग कहता है,उन्हे भी कम से कम देदो समन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
वतन पर कफन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
इस तरह से तू ना अपने प्यार का इजहार कर
सरहदों के हर शहीदों के लिये मुमकिन तो है
पर वतन के लूटने वालों का ना श्रृंगार कर
अस्मिता मेरे वतन की क्यों धरा में है दफन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
राम के और कृष्ण के उपदेश को सबने सुना
बुद्व और महावीर का हर वाकिया सबनेे गुना
गुरूग्रंथ के ईसा के लब्जों को भी गीता में पढा
र्दुभाग्य है ये देश क्यों बन गया मजहब धडा
मीरा कबीरा के भजन से होगया था गुल चमन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
जो मजहब और जातियों में बांटते हैं ये धरा
हिंदू,मुश्लिम ,सिक्ख, ईसाइ के बने हैं रहनुमा
खुद लिपट कर खादियों में वादियों में मस्त हैं
मेरे वतन की आबरु ,बे -आबरु में अस्त है
देवताओं की धरा को आज हम करते दमन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
स्वर्ण-पक्षी था कभी यह देश ,क्यों बेहाल है
मरघटों की राजनीति क्यों यंहा महाकाल है
बगुले दरिंदों से यंहा पर हंस बनकर घूमते
रोंदते हैं क्यों धरा , मद के नशे में झूमते
हो रहा है राष्ट्र के सम्मान का कैसा हवन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन
आड में तेरी सियासी लूटकर सब खा गये
मुल्क के, मजहब लूटेरे सल्तनत में छा गये
हर तरह की भ्रष्टता अब राजनीति हो गयी
व्यभिचार से तेरी तिरंगे अस्मिता भी खो गयी
कौन करता है तूझे इस देश में दिल से नमन
ऐ मेरे अहले चमन ,ऐ मेरे कौमी कफन
हम पडोसी मुल्क की हरकत सरहद पर सह रहे
आतंक की हर बाढ में भी हम हमेशा बह रहे
नेता हमारे देश के, बस कूटनीति चल रहे हैं
सम्मान से घुसपैंठिये आधे वतन में पल रहे हैं
आग कहता है,उन्हे भी कम से कम देदो समन
ऐ मेरे अहले चमन , ऐ मेरे कौमी कफन।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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