नौ दिन चले अढाई कोष
देश ने दिल खोल कर औकात से ज्यादा दिया
हे, सियासत के नमूनो, तुम बताओ क्या किया
भर दिया घर . बार सबका, जनमतों की भीड़ ने
चील और कव्वे सुरक्षित भी किये इस नीड ने
भुखमरी , बे - रोजगारी, दीनता मिट ना सकी
ये सियासी श्रृंखला व्यभिचार की पिट ना सकी
सम्पन्नता केवल सियासत को विरासत में मिली
दीनता के पुष्प की कलियां मरी ,फिर ना खिली
इतिहास के सत्तर वर्ष अब भी तरस कर बोलते हैं
हैसियत सत्ता सियासी सल्तनत की खोलते हैं
क्या कमी थी देश में ,जो दीनता जिन्दी खडी है
इस कदर बे-नाम हैं हम जिस कदर हिन्दी पडी हेै
सब सियासी देश के अय्यास बनकर जी रहे हैं
हम गरीबों का लहु सम-रस समझ कर पी रहे है
कौमों ,कबीलों , जातियों में बांटते हैं आदमी
क्यों ईद का बकरा समझ कर काटते हैं आदमी
पद के मद में कद सभी के हद से आगे बढ़ रहे हैं
सत्ता,सियासी भूत जनमत के गले क्यों पढ़रहे हैं
आधा वतन तो आज भी बस एक रोटी खोजता है
ये गिद्व कैसे बोटिया ,बोटों की देखो नोचता है
सिद्धान्त, समझौतों से सत्ता,चल रही है देश में
काश्मीर में आतंक पलता है सियासी भेष में
राजनीति, भेडियों के जमघटों से हो रही है
ये सियासत राष्ट्र के सम्मान को क्यों खो रही है
मठ,मन्दिरों की शान शौकत भी हमें ही मारती है
ये मस्जिदें शाही इमामों की सुलगती आरती है
धर्म का हर सामियाना, आसियाना ढूंढता है
धन्धा,यतीमो से हकीमों के सफर को मूंंडता है
अब कौन करता है हिफाजत दीन की इस देश में
अब कौन करता है हिफाजत धर्म की दरवेष में
शर्म आनी चाहिये इस दीनता को देख कर
आग भी मजबूर है ये शब्द निष्फल फेंक कर!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
देश ने दिल खोल कर औकात से ज्यादा दिया
हे, सियासत के नमूनो, तुम बताओ क्या किया
भर दिया घर . बार सबका, जनमतों की भीड़ ने
चील और कव्वे सुरक्षित भी किये इस नीड ने
भुखमरी , बे - रोजगारी, दीनता मिट ना सकी
ये सियासी श्रृंखला व्यभिचार की पिट ना सकी
सम्पन्नता केवल सियासत को विरासत में मिली
दीनता के पुष्प की कलियां मरी ,फिर ना खिली
इतिहास के सत्तर वर्ष अब भी तरस कर बोलते हैं
हैसियत सत्ता सियासी सल्तनत की खोलते हैं
क्या कमी थी देश में ,जो दीनता जिन्दी खडी है
इस कदर बे-नाम हैं हम जिस कदर हिन्दी पडी हेै
सब सियासी देश के अय्यास बनकर जी रहे हैं
हम गरीबों का लहु सम-रस समझ कर पी रहे है
कौमों ,कबीलों , जातियों में बांटते हैं आदमी
क्यों ईद का बकरा समझ कर काटते हैं आदमी
पद के मद में कद सभी के हद से आगे बढ़ रहे हैं
सत्ता,सियासी भूत जनमत के गले क्यों पढ़रहे हैं
आधा वतन तो आज भी बस एक रोटी खोजता है
ये गिद्व कैसे बोटिया ,बोटों की देखो नोचता है
सिद्धान्त, समझौतों से सत्ता,चल रही है देश में
काश्मीर में आतंक पलता है सियासी भेष में
राजनीति, भेडियों के जमघटों से हो रही है
ये सियासत राष्ट्र के सम्मान को क्यों खो रही है
मठ,मन्दिरों की शान शौकत भी हमें ही मारती है
ये मस्जिदें शाही इमामों की सुलगती आरती है
धर्म का हर सामियाना, आसियाना ढूंढता है
धन्धा,यतीमो से हकीमों के सफर को मूंंडता है
अब कौन करता है हिफाजत दीन की इस देश में
अब कौन करता है हिफाजत धर्म की दरवेष में
शर्म आनी चाहिये इस दीनता को देख कर
आग भी मजबूर है ये शब्द निष्फल फेंक कर!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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