Sunday, March 8, 2015

     इस एक पक्षीय भाव ने मेरे अन्तर हृदय को झकझोर दिया और नारी हृदय का भवनात्मक सुकोमल रुप उघड कर सामने आया ! साथ ही एक महत्व पूर्ण वैदिक मंत्र  मातृ देवो भव पित्री देवो भव ,गुरु देवो भव मंत्र में मातृ देवो भव सर्व प्रथम में आता है !इन सबके बावजूद भी शास्त्रों में नारी को निकृष्टता से वर्णित किया गया!और स्त्री मात्र भेाग्या बनकर रहगयी ! यदि युग-युगान्तर में कहीं  एक श्रुति या श्लोक नारी द्वारा रचा गया होता ओर उसका अन्य की भांति प्रचार-प्रसार होता तो निसन्देह ही नारी की यह दुर्दशा ना होती ! यही कारण है कि नारी मात्र भोग्य वस्तु बनकर रह गयी!
               इसके अतिरिक्त शास्त्र प्रमाण हेै कि सती अनुसुइया के पतिधर्म की शक्ति ने ब्रह्मा,विष्णु, शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर दिया!सावित्री तो स्वयं यमराज से अपने पति को पुर्नजिवित करा लायी,आधुनिक युग में अहिल्या बाई ,लक्ष्मी बाई,सुल्ताना,जीजाबाई के अतिरिक्त बहुत सी वीरांगनाऐं हैं जो पुरूष  वर्ग से भी उत्कृष्ट अवस्था में हैं,चाहे वह सांसारिक जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन हो! कुल मिलाकर मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि स्त्री में किसी भी क्षेत्र में पुरूष से कम क्षमता,प्रतिभा व सम्भावना नहीं है!

                     उदाहरणत
अभिशिप्त  हुयी  गौतम   पत्नि
अबला  को  शापित  कर डाला
घटना सतयुग  में घटित  हुयी
सोचो  कैसी   थी    वधु  बाला

त्रेता    सीता   द्वापर    द्रोपति
परमेश्वर   पुरुष   बना   डाला
सीता बन  में द्रोपदी  जन  में
देखो   अपमानित   वधुबाला

उत्थान पतन का अवलम्बन
वधु  ममता का कैसा बन्धन
यह दिव्य शक्ति  का आरोहण
संस्कार  श्रृष्टि  का  अन्वेषण

जल थल स्थल की वशुन्धरा
तपता यौवन ज्यों स्वर्ण खरा
अमुल्य  रत्न जग  जननी   है
हर  घाव  हृदय  का  करे हरा

ब्रह्माण्ड अखिल अखिलेश्रर की
वधु  शक्ति , भक्ति ,आशक्ति  है
ये रिम  झिम  वर्षा सावन की
वधु अनाशक्त अभि व्य क्ति  है

यह  आग  युगों की ज्वाला  है
विकराल  कराल    कराला   है
वधु   रंग   जमाती   हाला   है
वधु आग रचित  वधुशाला  है
               महान साहित्य कारो द्वारा महान कवियों की रचना में नारी मात्र श्रृंगार का माध्यम रही!चाहे वह संयोग  श्रृंगार हो या वियोग श्रृंगार,केन्द्र में नारी ही है!और  आधुनिक  युग में  तो कई  तथाकथित  कवि वर्ग  भी है, जो मात्र  नारी  को हास्य ओर व्ंयगात्मक  शैली से निम्न  स्तर तक पहुचाने  का कार्य निरन्तर करते रहते हैं !   कोई भी साहित्यकार कहीं या कभी  नारी से कुण्ठित या लज्जित हुआ हो तो उसने अपने कुण्ठित हृदय की  पीडा का प्रक्षेपण  अपने साहित्य में अवश्य वर्णित किया !
            प्रायः यह देखने में आया !इसका उदाहरण महा कवि कालिदास, तुलसी दास ,व भर्तृहरि इत्यादि हेैं ! जिनके संयोग व वियोग में नारी ही  केद्रित है!और आशेचर्य तो तब होता है कि कालिदास की प्रेरणादायिनी स्वयं विद्योत्तमा ,तुलसी दास की प्रेरणादायिनी रत्ना तथा सूरदास की प्रेरणादायी उनकी प्रेयसी कन्तो रही हो, इन सबके बावजूद भी इस आध्यात्मिक देश में दुर्गा,काली,उमा,पार्वती,लक्ष्मी, सरस्वति, सीता,राधा,अनुसुइया आदि कितनी नारियाॅं हें जो हमारे देवताओं ,भगवानों की प्रेरणा स्रोत रही हैं! ऐसा शास्त्र कहता है!

                                         
कवि  भर्तृहरि की  कुण्ठा   ने
कितना  नारी तृष्कार  किया
कालीदास   ने  नारी       का
इस  श्रृष्टि  में सत्कार  किया

          नारी शक्ति के भावो से उद्वेलित हो कर,ममत्व, वात्सल्य पूर्ण समाज से प्रेरणा पाकर वधुशाला शतक  लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं! अपने पाठकों से यह आकांक्षा रखता हूं कि इस अबोध बुद्वि से परिलक्षित हुई इस वधुशाला के शब्दों के अन्तराल में जो विकृत समाज की भाव भंगिमा है उसकी जटिलता से उपर उठकर नारी वेदना को ध्यान से परिलक्षित करें तोयह स्पष्ट हो जायेगा कि समाज में नारी का क्या मुल्यांकन होना चाहिये था!और यदि यही रुढी.वादी परंपरा समाज में चलती रही तो आने वाले समाज  एक विकृत रुप ले लेगा इसमें संदेह नही है! नारी के  वास्तिविक सौन्दर्य एवं गौरव  को बचाना ही  वधुशाला का  एक  मात्र  उद्वेश्य  ह


            वधुशाला - शतक
                  1
कौशिश   है  अंग-तरगं   बने
आनन्दित   अंग  बना  डाला
सामंजस   भृंग   तरंगो   का
रचता   नवरंग   व धू शा ला
               2
जुल्फें चन्दन बन व्याल बनी
खुशबू    है   दंश  कराल बनी
हर शाख में लिपटी माला सी
घन-घेार घटा घनशाल  बनी
               3
मस्तक में गगन  समाया  है
क्या सोम व्योम का नाता  है
त्रिनेत्र  भेद  की   गुप्त    गुहा
लट  से ललाट बल खाता  है
              4
सर सन्धान सी भृकुटि  बनी
कैसी   हरि  हर  की  दृष्टि   है
नटखट हर हरकत  हाट बनी
ज्यों इन्द्र धनुष पर  वृष्टि  है
                 5
नयना   है  तीव्र  कटारों   से
निर्जन बन सरल सरोवर सी
स्नान ध्यान ऋषि  देवों  का
श्रृष्टि  सोन्दर्य   मनोहर   सी
                  6
भृकुटि  भयंकर  बन    जाये
जब बात हृदय को  ना  भाये
कहीं विधु वधु शोला बनती है
कहीं  प्रेम नयन  में  हरषाये
                   7
पलके   नयना  पलकाती  है
दृष्टि   से  द्वार   हटाती     है
कब बन्द करे कब खुलजाये
हरी,  हर  से  हाट  हटाती  है
                8
पलकों  पर  बाल  झरोंखें  से
उनका  अपना  ही  धोखा   है
कुंजों   से  यौवन  झांक  रहा
कुदरत  का  खेल अनोखा  है
               9
कन्दराह है कर्ण हिमालय से
जहां गमन शब्द का होता  है
सूक्ष्म  शब्द  योगी   बनकर
प्रियतम के हिय में खेाता  है
                    10
कैसे कपोल  हैं रवि शशि  से
स्वछन्द व्यवस्थित मधुर रमण
सन्ध्या  सोन्दर्य घटित   होता
ज्यों  नभ सागर में छवि दर्पण
              11
अधरों   की   लाली   मतवाली
हिलमिल  सोंदर्य  बखान  करे
सरस   श्रृष्टि  अधरा धर    की
मासूम  अधर  रसपान     करे
                 12
संचार   व्यवस्था  जिव्ह्या  की
ये   गुप्त  गेह   रसराज    बनी
कंहीं  चूम रही  कंही  झूम रही
संगीत  सूरों  की   राग    बनी
                13
वधु   कंठ    सुधा  संवर्धन   है
ये  सरिता   सरस   बहाती   है
संयोग    वियोग  श्रृंगार   मधुर
वधुशाला  कण्ठ  से  गाती   है
                 14
बुद्वि  हृदय   मध्यस्त     बनी
संयोग    योग   बनवाती    है
अवलम्बन  है   दो  द्वीपों  का
चिन्तन मन्थन  करवाती  है
             15
स्तन हैं शिखर हिमालय   से
हिममण्डित से आच्छादित हैं
रवि लौ से  थोडा  सा  पिघले
गम्भी  दृष्टि    संम्पादित   है
             16
गोलाकृति   है  महाद्विपों  की
आकर्षित श्रृष्टि  भ्रमण करती
हर  छैल  छबीला वधु यौवन
आसक्त  वक्ष  अर्पण   करती
              17
स्तन है परिचय मां शशू  का
पय पान वधू   से  होता    है
नर का  आकर्षण  वक्ष   बने
अतरंग  खोज  में  खोता   है
              18                              
वधु  का  परिचय स्तन ही है
ये   उम्र  का  भेद  बताता  है
मर्मस्थल प्रियतम गुप्त रमण
हर  वधु   की यौवन  गाथा  है
                19                                    
नाभी  है  भंवर  बहाओं     का
जहां  नर पतंग  ही  फंसता  है
संचार  केन्द्र   उर्जा    का    है
इन्द्री  केा  रसों से  कसता  है
               20
ये  काम   देव ज्वाला मुख  है
लावा  की लहरे   गुप्त    लपट
विशय   वाशना    की  लौ  से
ये शीतल  तन अंगार  विकट
               21
भग,जनम द्वार  है  जीवों  का
जहां  बीज  अंकुरित  होता  है
सहवाशं  से   बदनाम     हुआ
हर  जीव  प्रतिष्ठा    खोता   है
                22
ये  प्रथम  सदन है रचना  का
जहां रज,हज पुण्य कमाता है
नौ मास  समाधि सुरति चढी
नवजात  शिशू  घर  आता  है
                  23
हर जीव की गेह  गुफा घर  है
योगी,वधु कोक में भ्रमण करे
फिर काम वाशना  पुरुषो  की
वधुशाला,वधु मिल रमण करे
               24
जंघायें  दो   अवलम्ब    बनी
तन तस्कर इस पर डोल रहा
स्तम्भ है,अम्बर आच्छादित
तन के सोन्दर्य को खोल रहा
                25
इस कदली-कन्द  के छूने से
रोमांच  वधु   हो   जाती   है
धमनी से धडकन दिल तक की
अंग- अंग में  रगं जमाती  है
                    26
लालाहित  कर  स्पर्श    हुआ
मदहोश   वधु   हो  जाती  है
नर   को महारत  हासिल  है
वधु लपट ज्वाल बन जती है
                    27
वधु  का शरीर  है   वधुशाला
कैसा   होगा   रब  मतवाला
किस भाव पिण्ड  रचा  होगा
आनन्दित है कण-कण खाला
                  28
ये  गर्म  हुई  तो   गलती  है
शीतलता  में जल  जाती  है
कैसी  ये  रचना   रहबर की
हर फन में यें बल खाती  है
               29
श्रृष्टि से वधु का जन्म हुआ
या वधु ने  श्रृष्टि  को  पाला
ये  भावों  का अन्वेषण   है
जो स्वयं बोलती वधुशाला
              30
कुण्ठित पुरुषो की भाषा ने
नारी को  नरक बना  डाला
सम्पन्न  हुयी है आज  वधु
खुद लिखती है वधु,वधुशाला
               31
वधु  बाला है वधु  यौवन  है
वधु बृद्वा   है  समशीर  बनी
ये जगत की जीवन जननी  है
हर वक्त की  ये  ताशीर  बनी
                32
वेदों  ने  विस्मृति  में   देखेा
नारी को निष्क्रीय कर  डाला
अपमान  में  नारी  के  देखो
सब धर्म शास्त्र भी रच डाला
               33
ये समय की शीतल सरिता है
जो  आज भयंकर  है ज्वाला
मधु से सब दुनिया मस्त हुयी
वधु  की मस्ती   है, वधुशाला
                   34
सतयुग  के  सारे ग्रन्थों    में
सब  में  नारी का शोषण  था
कामदेव  का   रुप       लिये
नारी अवलम्बन पोषण  था
                35
तृप्ती     वाना   का   साधन
देवों  ने वधु को  बना  डाला
अतृप्त  हुआ मानव जग  में
अब  ढूंढ रहा वधु वधुशाला
           36
त्रेता  में  सीता  का  जीवन
अंगारों  की  लौ का पथ था
मर्यादा पुरुष  श्री  राम  बने
सीता तो  मात्र मनोरथ था
              37
संकल्प   किया  वैदेही   ने
आदर्ष  राम  हो   श्रृष्टि   में
जनक सुता  बुनियाद बनी
स्पष्ट  हुआ  जग  दृष्टि   में
             38
जंगल-जंगल में  भटकाया
सीता सी वधु ने क्या पाया
अब  भी सब राम पुजारी हैं
ना सीता  भाव हृदय आया
                  39
आज  राम  पुरुषोत्तम   है
सीडी सीता को बना डाला
सागर सम रुप हृदय वधु का
कष्टों  में  कौशल  वधुशाला
                40
द्वापर में  द्रोपदी  की  पीडा
घर की वधु का तृष्कार किया
ये  एेसे समय  की घटना   है
घनश्याम स्वयं थे बने  पिया
              41
इतिहास गवाह है  द्वापर  का
नारी  ने    पांचो  को    पाला
येाद्वा  पति भी  असहाय  हुये
वधु की इज्जत थी वधुशाला
                42
कहीं  लक्ष्मी  है कहीं  पार्वती
कहीं बनी सरस्वती वधुबाला
सतयुग,त्रेता, द्वापर,कलियुग
नारी है जग  की  मृग- छाला
              43
ना जाने  कितनी सतियां   है
जिसने मर्यादा   को     पाला
आज   हृदय  अवरुद्व    हुआ
मधु-मद में मस्त  वधुशाला
                 44
पुरुषों  में  इन्द्र  समाया    है
रम्भा   सी  सुन्दर  नारी   है
उर्वशी ,  मेनका    की   बातें
अब भी इतिहास में जारी  हैं
                 45
नारी  मनोरंजन  है  जग का
ये काव्य शास्त्र में  रच डाला
आज समय  विपरीत   हुआ
रण चण्डी  है वधु वधुशाला
                46
कवि भतृहरि की रचना  ने
कितना नारी अपमान किया
कालिदास  ने   नारी      को
इस श्रृष्टि  में सम्मान  दिया
               47
दुष्यन्त को प्रेम में नारी  ने
राजा  से  रंक  बना    डाला
कालिदास की   रचना    में
उत्कृष्ट  बनी है  व धुशा ला
             48
कवि नारी से पिडित  हो तो
कविता  वियोग उगलती  है
प्रेम  पुष्प  विकसित  हो तो
वधु से ही कविता  फलती है
               49
कुमार  सम्भवम्   में   देखो
वधु  को  श्रृंगार  बना   डाला
कवि कालीदास की रचना में
वधु बनी श्रृष्टि का हमप्याला
               50
नारी  का  ये कौमार्य   बदन
बनता श्रृष्टि  सोंन्दर्य   पतन
कहीं योगी रुप  है  शंकर का
कहीं अंग-अंग रमता है मदन
               51
योग- भोग   समरुप   सरस
श्रृष्टि  ने  ऐसी   रची    बाला
ये विशय  वृष्टि  नारायण की
वधु  से बनती   है   वधुशला
               52
कुछ वधु विरोधी  मजहब  हैं
नारी  निकृष्ट    बना     डाली
हर  शब्द  पुरुष  प्रधान  बना
कैसी  नारी  की   छवि  काली
               53
नारी  है नशल - फसल रचना
जो  पुरुष  वृक्ष की    हैे   डाली
वधु  ने गुल चमन बना  डाला
सिंचन करता  है   नर   माली
          54
कहते   हैं  नारी   बे ग म   है
जो  गम का जीवन जीती  है
सहती  है  अत्याचार  विकट
निज  घूंट लहु  का  पीती   है
               55
क्या धर्म इजाजत नही  देता
खुश  हो जीवन  में मधुबाला
आज  मजहब कमजोर  हुआ
हृदय  विदीर्ण  है    वधुशाला
               56
मजहब  में नारी  दफन  हुयी
घूंघट  में  जीवन अस्त  हुआ
विक्षिप्त नरों  की  दुनिया  में
संस्कार श्रृष्टि  से  पस्त  हुआ
               57
जंहा नूर जन्मता  बेगम   से
गम  से  बेगम को भर  डाला
अबला अब सबला  बन  बैठी
कैसी   सिरकस्त    वधुशाला
               58
पश्चिम ने वधु को खोल दिया
हर  वधु  बनी   है   वधुशाला
नर   पर  नारी परभावी     है
श्रृष्टि   में   शंशय   कर डाला
       59
वहां मात्र  भोग  है  वधु बनी
जीवन में मदिरा  का प्याला
विक्षिप्त बना  नर  जीवन  में
नारी   है   मस्त   मधुशाला
               60
स्वालम्बी जीवन पश्चिम का
नारी   स्वयं    बना     डाला
वेद  - शास्त्र  से   वचिंत   थे
नर   कैस  बनता  मतवाला
      61
नारी को जननी   नही माना
नर - नारी में कोइ भेद  नही
रमणी खुद रमण-भ्रमण करती
नर  को  नारी से    खेद     नही
                62
दोनो  गाडी.  के     चाक    बने
स्वछन्द  साथ    में चलते   है
नारी की विकसित  क्षमता  से
सब  राष्ट्र  स्वयं में  पलते    हैं
               63
नारी   का   पूर्ण   मनोरथ   है
नर    अश्व  बना, नारी  रथ  है
तन से मन  से स्वातन्त्र  बने
नारी का  मत  ही सतपथ   है
              64
पश्चिम की   नारी  सबला  है
विकृत अब भोग का भाव बना
जो स्वंय में जीवन जीता    है
उसका जीवन  ना  घाव  बना
               65
मन मस्तिष्क की  नारी    ने
हृदय प्रवेश अब  कर    डाला
ये   समय  चक्र   बतलायेगा
वो  वीर   बेनेगी     वधुषाला
    66
मिस  मैरी  का बुत देख जरा
ईशा  को जिसने जन्म दिया
ये  चमत्कार  है   नारी   का
भटकी हुयी कौम को सनम दिया
                  67
आज जगत  में  नारी   बिना
कोई काम चलता- फलता  है
कौम , कबीला , राष्ट्र    जमी
सब  नारी से  ही चलता   है
 68
कंही भोग में नारी केा देखो
कहीं योग ब्रह्म में लीन बनी
कंहीं रचना श्रृष्टि  की करती
कंहीं राष्ट्रों की गमगीन बनी
                69
एवरेस्ट   पर    नारी     का
कैसा ये विजय पताका   है
अब   संघर्ष   प्रवीण   बनी
कैसी कुदरत की  आका  है
  70
नारी   नभ  में   उडन  भरे
कहीं तैर रही जलधि तल में
कहीे काम देव ज्वाला मुख है
कहीं प्रियतम  है तन शीतल में
               71
कहीं  करती  काम  करो.डो का
हर  अदा में  नर घायल   होता
श्रृंगार  श्रृष्टि   वरदान    मिला
हर  काम  प्रेम  का पल  होता
             72
अहंकार   नर   में        देखो
नारी स्वाभिमान की मूरत है
मां, भगनी, पत्नि  में    देखो
नारी  में रब   की  सूरत    है
               73
निकृष्ट  नरों की  रचना   में
नारी क्यों  नगर-वधू  होती
मजबूरी नाम है अबला  का
श्रृष्टि   मानवता   पर  रेाती
              74
वैष्यालय  हो या   देवालय
सोंन्दर्य श्रृष्टि का   देती   है
कहीं करुणा है कहीं तरुणा  है
भावों  में सबको भिगोती  है
  75
नर के कारण वधु,वधिक बनी
संहार श्रृष्टि    का   कर   डाला
विस्मय में आज समाज बना
वधु बनी  भंयकर   वधुशाला
                76
मन्दिर  में पूजा  मूरत   की
वधुशाला  में  है   सूरत  की
मन्दिर  में पत्थर की  मूरत
वधुशाला  प्रेम की  है  सूरत
              77
ये मरहम दिलों के घावों का
हृदय में प्रेम  के    भावों का
टूटे हुये  दिल  बहलाती    है
वधुशाला   प्रेम  लुटाती   है
                  78
वधु हाला है मधु  प्याला  है
वधु विकराल सी जवाला  है
वधु सुकुमार सी    बाला  है
वधु यौवन मुख पर ताला है
               79
कहीं  षडयन्त्र  का  जाला है
कहीं पर ये वतन की खाला है
कहीं हृदय प्रेम प्रफुल्लित  है
कहीं कृपाण,कहीं  भाला    है
             80
सहयोग  योग  मृगछाला  है
रजनी  में ज्योति उजाला   है
खबरों  में  मिर्च  मशाला   है
कहीं जाली  है कहीं जाला  है
    81
मनेारंजन  में  मधुबाला   है
रण में  विकराल कराला  है
सोंन्दर्य श्रृष्टि की जननी   है
ये   मेरी वधु ,वधुशाला   है
               82
आरक्षण करने  वालों    नें
नारी  कमजोर  बना डाली
स्थान  दूसरा  कर   डाला
जन-मन में बात समा डाली
           83
स्वाभिमान दृड   नारी    का
दया    से   दीन  बना  डाला
रचना में   मेरी  हिम्मत   है
ये सबल  भाव  है वधुशाला
               84
लिंग-भेद अब  खत्म  हुआ
मध्यस्त की कोइ बात नही
विज्ञान  ने  भेद मिटा डाला
नर, नारी की कोइ जात नही
               85
जब सारा  काम बराबर  का
अबला क्यों भिन्न व्यवस्था है
जो दया  दिखाते  नारी   पर
नारायण  उन पर  हंसता  है
               86
आरक्षण सबला   को  देकर
उसका बल क्षीण बना डाला
जो सिंह वाहिनी  रण चण्डी
रणछोड. बने क्यों?वधुबाला
                  87
आज  पुरुष  कमजोर   बना
आरक्षण    उसे    जरुरी   है
पूर्ण    सबल   अब  नारी  है
अब   नही  वधु  मजबूरी  है
             88
विकलांग बना जो जीवन में
आरक्षण   ने   उसको  पाला          
मेरी तो कलम ईलम वधु  है
वधु आत्मशक्ति है वधुशाला
                89
मधु  मधुशाला है ज्ञान  कुंज
श्रोता जिसका  रस  पीते   हैं
वधु   वधुशाला  है  प्रेम  पुंज
जहां  ब्रह्मभाव  ही  जीते   है
                 90
जड चेतन और ब्रह्माण्ड जंमी
जग में   ये श्रृष्टि शिवाला  है
बाहर से  प्रेम का भोग-भाव
अंतर  में  प्रभु वधुशाला  है
                 91
वधु दिव्यशक्ति है अब जग में
मन,मन्दि ,मस्जिद आलय हैं
यंहा प्रेम भक्ति का नियम नहीं
ये   विद्रोही     विद्यालय      है
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सतयुग ,  त्रेता , द्धापर   देखो
नारी    ने  प्रेम   लुटाया    था
बस भेद  यही था मनुष  नही,
ऋषि, मुनि, देव ने  पाया था
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वधु  तो सरिता है सागर की
मधुशाला है  मधु गागर की
वधु पथिक प्रेम के ब्रह्म निकट
मधुशाला मृत्यु अल्प विकट
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सब दुखो को क्षण में दूर करे
मानव - मानव  में भेद  नहीं
वधु हृदय   प्रेम  भरपूर   करे
वधुशाला को कोई  खेद  नही
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फिर  भी वधु  प्रेम लुटात  है
जन-जन के दिल बहलाती है
हर  फन के लोगों के दिल में
वधु - शाला प्रेम  जगाती  है
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काम ,क्रोध,मद,लोभ , मोह
विकट विषय की  ज्वाला है
अनुभव  से जीवन को देखो
ये ! जीवन ही वधुशाला  है
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संकल्प  किया मेरे दिल ने
वधु को वधु का स्थान मिले
नारायण की इस  रचना  में
प्रेम वृक्ष   की   शाख  हिले
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मधु पाठक हो वधु रचना हो
पैग से  पैगम्बर झूम   उठे
साकार  बने वधु  वधुशाला
सोन्दर्य श्रृष्टि को चूम  उठे
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वधु,वशुन्धरा,बन जायेगी
नर,मणि रत्न , कहलायेगा
श्रृष्टि का अमिट खजाना है
सोंन्दर्य जगत में  आयेगा
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फिर नमन करेगी श्रृष्टि को
आदर्ष    वधु  वधु     होगी
वधुषाला से वधु निखरेगी
वधुशाला  मेरी वधु  हागी ।।

इति    वधुशाला    शतकम्
न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                       मो0 9897399815

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