Sunday, March 29, 2015

                  शूल के फूल                
अन्ना   तेरी   नर्सरीयों   में   कीडे  पड  गये
राजनीति के  मुल्य  देख,दिल्ली में सढ गये
अब सबसे अच्छा  तोता  गोता  मार  रहा है
ये  राजनीति  विध्वंस   देश   को तार रहा है

तू स्वाभिमान  कम  अहंकार को पाल रहा हेै
ये  नये  किस्म  के  कीडे  देश में डाल रहा है
कल  के  जोगी, जटा-जूट  सब  सिद्व हो गये
सत्ता  का  थोडा  खून  लगा तो  गिद्व हो गये

अन्दर-बाहर  के  भावों  में  कुछ मेल नही है
ये  भारत  की , पैसेन्जर   कोई   रेल नही है
अब  सारे   टी.  टी.,  सीटी  लेकर घूम रहे है
ये  कविराज   श्रृंगार   रसों   में   झूम  रहे है

भानूमति  के   कुडमे   ने   औकात दिखायी
अब  कितने  गाँधी  पैदा करोगे अन्ना  भाई
क्या  राग  सुरों  को  बर्षाती   मेढक  गायेंगे
क्या अन्ना   तेरी   नर्सरी   से  नेता आयेगे

नर्सरीयो   में,  पौधे   कम,   गाजर  घासे हेैं
राजनीति   में    तोला,   रत्ती,  सब  मासे हैं
नये - नये  मुल्लों   से  मस्जिद  घबराती है
राजनीति   तो   केवल  अनुभव  से आती है

ये अल्प दृष्टि क्यो्ं कल्पश्रृष्टि को पनपाती हेै
गाजर  घासें  गीत  बसन्त के क्यों  गाती है
पतझड के अनुभव  को  तो  जीवन में झेलो
प्यारे  बच्चों  अभी  आग  से  तो मत खेलो

अन्ना   अपना  मूँह   खोलो  चेलो को डाटों
राजनीति  की  कच्ची फसलें और ना काटो
ये तुझ को ना माने,इनका भी बाप  तू ही है
इनके  कू - कर्मो  का भी  अभिशाप तू ही है

बेदखल  करो  जल्दी  से  अपना मूँह खोलो
राजनीति का  डी. एन.ऐ.,पथ  पर ना घोलो
मै कवि आग खबरो से सब सुनता जाता हूँ
राजनीति  की  घास  आग  से  सुलगाता हूँ।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
               मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

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