नारी का बिगडता स्वरुप
चलचित्रों में नंगी नारी हम कहते हैं कलाकार है
पुरुष प्रेम में लिपट रहा है सच्चाई है बलात्कार है
निर्माता भी चूम रहा धन से यौवन लाचार है
नंगे नर नारी को देखो फिर कहते हैं व्यभिचार है
विज्ञापन में नंगा पन है भारत माता लुटी पढी है
बात धरम् की करने वालों की क्यों आंखे फुटी पढी हैं
अब तो दुनिया ही नंगी है शर्म हया की कहां बात है
काम -वाशना की कौमौ में मानवता की कहां जात है
श्रृंगार रसों की रचना में अंगार धधकते देख रहा हूं
दुविधा मेरी मजबूरी है मैं भी आंखें सेंक रहा हूॅं
कटु सत्य है दुनिया में जब नंगा यौवन हो जाता है
संस्कार श्रृष्टि में दानवतापन ही मानवता को खाता है
शास्त्र गवाह है मर्यादा और इज्जत नारी को कहते थे
मातृ-शक्ति की भाव-भक्ति में ईश्वर के भी गुण रहते थे
आज वाशना कीअभिव्यक्ति नारी क्यों बनती जाती है
राष्ट्र पतन का कारण नारी,भारत माता को खाती है
सारे चैनल बलात्कार की चर्चा ,चुन-चुन कर लाते हैं
व्यभिचार से पतिव्रता और यति-सति को,समझाते हैं
भावुकता के तर्क यंहा पर,इज्जत को खुद खोल रहे हैं
कवि आग जितना सुनते हैं,बस उतना ही बोल रहे हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
चलचित्रों में नंगी नारी हम कहते हैं कलाकार है
पुरुष प्रेम में लिपट रहा है सच्चाई है बलात्कार है
निर्माता भी चूम रहा धन से यौवन लाचार है
नंगे नर नारी को देखो फिर कहते हैं व्यभिचार है
विज्ञापन में नंगा पन है भारत माता लुटी पढी है
बात धरम् की करने वालों की क्यों आंखे फुटी पढी हैं
अब तो दुनिया ही नंगी है शर्म हया की कहां बात है
काम -वाशना की कौमौ में मानवता की कहां जात है
श्रृंगार रसों की रचना में अंगार धधकते देख रहा हूं
दुविधा मेरी मजबूरी है मैं भी आंखें सेंक रहा हूॅं
कटु सत्य है दुनिया में जब नंगा यौवन हो जाता है
संस्कार श्रृष्टि में दानवतापन ही मानवता को खाता है
शास्त्र गवाह है मर्यादा और इज्जत नारी को कहते थे
मातृ-शक्ति की भाव-भक्ति में ईश्वर के भी गुण रहते थे
आज वाशना कीअभिव्यक्ति नारी क्यों बनती जाती है
राष्ट्र पतन का कारण नारी,भारत माता को खाती है
सारे चैनल बलात्कार की चर्चा ,चुन-चुन कर लाते हैं
व्यभिचार से पतिव्रता और यति-सति को,समझाते हैं
भावुकता के तर्क यंहा पर,इज्जत को खुद खोल रहे हैं
कवि आग जितना सुनते हैं,बस उतना ही बोल रहे हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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