Sunday, March 15, 2015

              नारी का बिगडता स्वरुप
चलचित्रों  में  नंगी   नारी   हम  कहते  हैं  कलाकार है
पुरुष प्रेम  में  लिपट रहा  है  सच्चाई  है  बलात्कार है
निर्माता   भी   चूम   रहा  धन   से   यौवन  लाचार है
नंगे  नर  नारी  को  देखो  फिर  कहते  हैं व्यभिचार है

विज्ञापन  में  नंगा  पन  है  भारत  माता  लुटी पढी है
बात धरम् की करने वालों की  क्यों  आंखे फुटी पढी हैं
अब तो दुनिया  ही  नंगी  है शर्म हया  की कहां बात है
काम -वाशना की कौमौ में  मानवता  की  कहां जात है

श्रृंगार रसों  की  रचना  में  अंगार धधकते  देख रहा हूं
दुविधा  मेरी  मजबूरी  है  मैं  भी  आंखें   सेंक  रहा हूॅं
कटु सत्य  है  दुनिया  में जब नंगा  यौवन हो जाता है
संस्कार श्रृष्टि में दानवतापन ही  मानवता को खाता है

शास्त्र गवाह  है मर्यादा और इज्जत  नारी को कहते थे
मातृ-शक्ति की भाव-भक्ति में ईश्वर के  भी गुण रहते थे
आज वाशना कीअभिव्यक्ति नारी क्यों  बनती जाती है
राष्ट्र पतन  का  कारण  नारी,भारत  माता को खाती है

सारे चैनल बलात्कार की  चर्चा ,चुन-चुन  कर लाते हैं
व्यभिचार से पतिव्रता और यति-सति को,समझाते हैं
भावुकता के तर्क यंहा पर,इज्जत  को खुद खोल रहे हैं
कवि आग  जितना सुनते हैं,बस उतना ही बोल रहे हैं।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

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