बूरा ना मानो होली है
ना जाने कितने रंगो की होली होती है
हास्य-व्यंग में हर फन की बोली होती है
आज जगत में खून रंग से रंग जाता है
फाग, राग का आग जगत में फैलाता है
समाचार पत्र
अखवारों में जगह -जगह खूनी होली है
ये समाचार प्रयाय भ्रष्ट का हम जोलीहै
बलात्कार ,श्रृगांर स्वयं ही बन जाता है
इन खबरों से सम्पादक रोटी खाता हेै
नवभारत ,दैनिक हो या अमर उजाला
दर्पण,हिन्दुस्तान,खबर गडबड घोटाला
राजनीति के चोर उचक्कों की खबरें है
ये शब्दों के सागर क्यों खूनी डबरें हैं
राजस्व
यहाॅं प्रतिबन्ध है खसरों पर पटटे जारी हैं
अब तो मालिक एस,डी,एम है पटवारी हैे
मठ,मन्दिर भी इनके चक्कर काट रहे हैं
राष्ट्र सम्पत्ति, ग्राम सभा को बाॅंट रहे हैं
अव्वल,दोयम छाॅंट छाॅटं कर बतलाते हैं
अव्वल,दोयम छाॅंट छाॅटं कर बतलाते हैं
इस विभाग में नेता जी के कई खातेंहैं
खसराऔर खतौनी दाखिल खारिज देखो
भूमिधर बनना है तो बस पैसे फेंको
प्रापर्टी डीलर के चक्कर काट रहे है
भू - माफिया शहर गाॅव को बाॅट रहे है
भू - माफिया शहर गाॅव को बाॅट रहे है
अभिलेखो मे मेरे देश की लगती बोली
भारत माॅ की छाती मे देखो ये होली
पुलिस
पुलिस पर्व होली है कैसा रंग बिरंगा
शहर शान्त है फिर भी क्यो होता है दगा
थाना मंदिर है नेता और व्यापारी का
मजबूरी व्यवसाय बना है लाचारी का
चौराहों पर तास चौकडी जमी हुयी है
तमाश बीन ये पुलिस भी रमी हुयी है
हर गली , मुहल्ले ,चौराहे मे बेचो दारू
हिन्दुस्तानी पुलिस मित्र है देख जूझारू
वकील
अधिवक्ता जज मुजरिम की है एक ही बोली
न्यायालय में देखो रंग रंगीली होली
अन्याय न्याय पर रंग घोल कर डाल रहा है
अघिवक्ता जज मिलकर मुजरिम पाल रहा है
गीता की कसमें खातें हैं फिर भी पंगा
न्यायालय में देखो ईश्वर ,अल्ला नंगा
राजनीति संरक्षण में चलती है गोली
जज,नेता,अधिवक्ता ,खेलो खूनी होली
ठेकेदार
ठेकेदार ही असली होली खेल रहे हैं
साइफन ,सडक,गूल,फाइल में पेल रहे है
रंग बिरंगी थैली सबको बाॅंट रहे है
पुस्ते ,बाॅंध , सडक फाइल में छाॅंट रहे हैं
र्निमाण नियन्ता, दारू मुर्गा बन जाता है
सडक सेतु को बरसाती नाला खाता है
एम0बी0 की पिचकारी रंग में रंगजाती है
निर्माण नियन्ता अभियन्ता टस्कर हाथी है
विभागीय
अधिकारी बाबू भी होली खेल रहा है
ये रंग बिरंगी फाइल दफ्तर झेल रहा है
कलम बनी पिचकारी भ्रष्टाचार उगलती
अधिकारी और बाबू से तो सत्ता पलती
ये मेरूदण्ड है व्यभिचारी भ्रष्टाचारी का
हर काम यहाॅं पर होता है बस फनकारी का
प्रजातन्त्र का हर विभाग में पक्का रंग है
बस इनकी होली के रंगों से राष्ट्र दंग है
शिक्षा
ये सरकारी गुरूकुल कैसा शिशूनिकेतन
सारे गूरू जी माॅंग रहे हैं उॅंचा वेतन
सारी अर्थ व्यवस्था घर की सरकारी है
जीवन बीमा गुरूजी का, घर-घर जारी है
गुरूजी और गुरू पत्नि दोनो ही टीचर है
अपने ही बच्चों का देखो क्या फ्यूचर है
बह्मचर्य की मजबूरी को झेल रहे हैं
दोनो अपनी -अपनी होली खेल रहे हैं
ढूॅंढ ढूॅंढ कर दीन दुखी बच्चे आतें हैं
खबरें मिलती हैं गुरूजी राशन खाते हैं
इस शिक्षा से कौन शिशू अव्वल आता है
नवअंकुर को शिशूनिकेतन क्यों खाता है
डाक्टर
देख चिकित्सक कैसी होली खेल रहा है
स्वास्थ व्यवस्था मुर्दा, जिन्दा झेल रहा है
रक्त चाप ,मल ,मूत्र जाॅंच का सूत्र बनाओ
सबसे पहले रोगी को सूगर दिखलाओ
सूगर वाले पक्के ग्राहक बन जाते है
सभी चिकित्सक रोगी से रोटी खाते हैं
व्यवसायी उपचार चिकित्सा को भाती है
जिन्दे को तो कफन चिकित्सा पहनाती है
नर्स पर्स का वजन देख कर ही आती है
रोगी को एकान्त व्यवस्था क्यों भाती है
सुन्दर - सुन्दर नर्सो से उपचार कराओ
रोगी पैसे वाले हो तो घर बुलवाओ
व्यापारी
व्यवसायी का माल मिलावट ही धन्धा है
ये ढेड अरब की आबादी घर-घर अन्धा है
बे - मतलब के बच्चे पैदा हो जाते है
व्यवसायी और जन-संख्या गहरे नाते हैं
दिन पर दिन मॅहगायी क्यों बढती जाती है
ये अर्थ व्यवस्था हर गरीब को क्यों खाती है
व्यापारी और नेता दानों एक जात है
एक है कच्छा एक है नाडा क्या साथ है
अभिनेता
नंगी जंघायें ,तन पर केवल चोली है
ये नंगा तन ही फिल्मी दुनिया की होली है
कैटरीना, शिल्पा और राखी देख विपासा
यौवनता में काम-सूत्र कैसी अभिलाशा
मधुबाला ,नर्गिस हो हेमा, राखी, रेखा,
बिन-ब्याही माताओं को दुनिया ने देखा
गोविन्दा अमिताभ हमें क्योे भा जाते है
एक करोड में केवल, पुट्ठे मटकाते हैं
नंगी नारी विश्व - सुन्दरी बन जाती है
ये नारंगी निर्माताओ को भाती हेै
गाय दुधारू हो तो घर भी मिल जाता हेै
माया हो तो चरित्र-हीन सबको भाता है
आश्रम
सब रंगों का मिश्रण मठ मन्दिर में पाओ
होली और दीवाली मिलकर रोज मनाओ
उर्वषी, मेनका, रम्भा के नित दर्शन होते
इन्द्र द्वार पर मंजनू से सिर पकड के रोते
रंग बिरंगी परीयाॅं गुरू से खेल रही है
मठ मन्दिर के बह्मचर्य को झेल रही है
परदेशी फुलझडियाॅं आसन में सोती है
मठ मन्दिर में मस्ती की होली होती है
बाबा
एक लंगोटी,अरब,खरब की माया अन्दर
एक मदारी बने हुये है सारे बन्दर
ये कैसा नंगा , माया में धॅसा पडा है
राजनीति में देख लंगोटा फसा पडा है
यौन-शक्ति की औषध बाबा बना रहा है
बह्मचर्य क्यों, काम-वाशना जना रहा हेै
दबी हुयी अभिलाषा सब कुछ बकवाती है
बाबा की पिडित जनता में ही ख्यति हेै
अन्ना
अन्ना के चेले आवारा डोल रहे है
जो भी मुॅह में आये खुलकर बोल रहे है
राजनीति की आशा, तृष्णा में डूबे है
समझ नही आता इनके क्या मंसूबे है
स्वाभिमान मे अभिमान भी दिख जाता है
आम आदमी राजनीति में कब आता है
सिर में टोपी,मुँह में गाली आम बात है
सत्ता और सियासत की ये औकात है
कवि
हम कवि लोग है दीन-हीन समझाते आये
समय-समय पर राष्ट्र-गीत हमने ही गाये
तपा - तपा कर शब्द,छन्द में डाल रहे है
इस भारत को हम कविता से पाल रहे है
हम शब्दो से व्यभिचारी को ठोक रहे हैं
हम चैकीदार वतन के कविता भौंक रहे हैं
कुत्तो मे आर्दश कवि को दिख जाता है
सभ्रान्त निकम्मा नेता भारत को खाता है
आओ मिलकर राष्ट्र -भक्त सौगन्ध उठाओ
इस होली में कुछ तो नया करो,दिखाओ
व्यभिचारों की होली से प्रहलाद बचा हैे
हर युग में इस भारत ने इतिहास रचा है
ये महा कुम्भ है हर रंगो की खेलो होली
भाषण गोंण करो शब्दों की बोलो बोली
अपने अपने भावों की सब भंग चढाओ
व्यंग जंग को छोडो मिल कर रंग लगाओ
व्यंग जंग को छोडो मिल कर रंग लगाओ
दिल में जो गुब्बार छिपे हैें बाहर छोडो
उलझे धागों में ,फागों के रंग निचोडो
देखो रंग रंगीली दुनिया बन जायेगी
प्रेम पुनः होली हर झोली में लायेगी ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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