Tuesday, March 24, 2015

                    क्रिकेट और भारत
देखो  अेग्रेजों  की  माया   क्रिकेट  कैसा  खेल  बनाया
एक नया अवतार देश में  कफन ओढकर भारत आया
सारी दुनिया काम छोड  कर  टी.वी. चैनल  देख रही है
अपने दिल की भाव भंगिमा को  शब्दों  से फेंक रही है

क्रिकेट  की   दुनिया  में  देखो   नये  ढंग  का जेहाद है
आन,बान,सम्मान दाॅंव  पर  लगा  हुआ आतंकवाद है
हथ-गोले   सी  घातक  गेंदे  मैदानों  पर   घूम  रही हैं
खून टपकती  आॅंखे  देखो कफन ओढ कर झूम रही हैं

फेंक   रहे    हैं  गेंदें  जैसे  तोपे ,  गोला   दाग  रही हैं
पागल  होकर   सारी  दुनिया  चैराहों  पर  भाग रही है
कुछ  पागल तो  झण्डे  लेकर  मैदानों  पर  दौड रहे हैं
चौके -छक्के तमाश बीन  के  हाथ, पैर,सर फोड रहे हैं

अहंकार को मनोविनोद का द्योतक दुनिया मान रही है
देख निकम्मी दुनिया पागल हो कर सीना तान रही है
जिसे  देख लो  वही पूछता है  कितना  स्कोर  हुआ है
पागलपन की इस क्रिडा से हास्य,व्यंग भी बोर हुआ है

भारत,पाकिस्तानी  खेलों से हरदम सरहद  हिलती है
आतंकों को  इस खेल में  पनाह भीड से ही मिलती है
फिर  होता  है खून  खेल  का , गौरव राष्ट्र  दिलायेगा
भारत   में  आतंकवाद  अब  क्रिकेट  से  ही  आयेगा

गिल्ली, डंडा  और   कबड्डी  को   इतिहास बनाते हो
हाकी, बालीबाल   छोड   कर   पाश्चात्य  अपनाते हो
ईश्वर  ,अल्ला भूल गये अब, क्रिकेट  नया विघाता है
हिन्दुस्तानी   भ्रूण  गर्भ  में, अंग्रेजी  गाना   गाता है

बिन पैसे  के,सबसे मंहगी सुख सुविधा को ये पाते है
चौके,छक्के शतक लगाकर कई  करोड ये खा जाते है
रंग - रंगीला   विज्ञापन  भीे   इनका  ढंग दिखाता है
क्रिकेट  का भगवान  देश  में  अय्यासी  से  खाता है

सुन्दर - सुन्दर,रंग - बिरंगी   नारी   जान  लुटाती है
कामदेव   की   सारी  घटना ,हर  चैनल  में आती है
किसको पकडा  किसको छोडा  ये  कैसी  अय्यासी है
अंग्रेजी   संस्कार  यहाॅं  पर,  असली  भारत वाशी है

राजनीति  से प्रतिभाओं को, मैने यहाॅं कुचलते देखा
सट्टेबाजों से मोदी  और  कलमाडी  को  पलते देखा
मैच फिक्स के माहिर खेलखिलाडी भी इसमें होते हैं
कई राष्ट्र तो इस क्रिकेट से अपनी गरिमा को खोते हैं

डेढ अरब की आबादी को क्या  क्रिकेट अब रोटी देगा
क्या भारत में फिर से अंग्रेजों का हिन्दुस्तान बनेगा
धर्म्,कर्म् की वशुन्धरा की  क्यों  दुनिया में निन्दा है
सत्य सनातन की  धरती  में राष्ट्र  भक्त  शर्मिन्दा है

ये  खेल तो माया से  सम्पन्न  राष्ट्र की  ही  क्रिडा है
रोटी  कपडा और मकान की आधे   भारत में पीडा है
प्रतिष्प्रधायें किसी   राष्ट्र   को ,उॅंचा  नही  बनाती है
कुरूक्षेत्र   से  गीता  हमको   बार -बार  समझाती है

ये  खेल  कोई शोध नही है क्रिकेट का विरोध नही है
रंग - रंगीली अय्यासी  से  मेरा भी प्रतिशोध नही है
इस खेल  मे क्षेत्रवाद  की आग धधकती देख रहा हॅूं
में तो भारत की कुण्ठा को शब्द बाण से फेंक रहा हॅूं

संस्कार हमारे  कच्चे हैं जो जगह जगह ढल जाते हैं
स्वाभिमान, अस्तित्व  नही  आडम्बर दिखलाते हैं
स्वालम्बन ,स्पन्दन जैसा जीवन  खेल  हमारा  हो
खेल -भावना की मानवता  ये  भारत का  नारा  हो।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                     मो0 9897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

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