(यह कविता तीन माह पूर्व लिखी गयी थी जो अब चरितार्थ हो रही हेै)
आपका भविष्य
भानुमति का कुडमा सडकों पर आयेगा
अब आम आदमी खास आदमी कहलायेगा
इस राजनीति में अहंकार तो टकराते हैं
क्यों सारे पागल आम आदमी बन जाते हैं
अब धीरे - धीरे बडे - बडे़ भी मुँह खोलेगें
संजय और विस्वास अभी खुलकर बोलेंगे
कविराज भी चुप हैे, हरकत भाँप रहा है
अपने घर की गहरायी को माप रहा है
राजनीति में आने का कुछ तो कारण हेै
कवि, भाट सब आम पार्टी में चारण है
घीरे - धीरे भ्रूण गर्भ में पनप रहा हैे
आम आदमी किलस रहा है, कलप रहा है
भूखे को रोटी मिल जाये, क्या छोडेगा
अक्षम था जो चलने में, वोे अब दौडेगा
आम आदमी प्रजातन्त्र सडको पर लाया
बन्दर के हाथों में चाकू क्यों पकडाया
एक माह से उथल-पुथल में फंसे पडे थे
सभी एक दिखते थे सबके अलग धडे थे
सत्ता और संघर्ष अलग है, अलग दिशा है
राजनीति की मृगतृष्णा भी एक निशा है
राजनीति के कोठे पर ये सब जायज है
चरित्र-हीन सन्ताने भी ,सब नाजायज है
राजनीति में बाप बदलना आम बात है
वर्ण-शंकरों की दुनिया में कंहा जात है
पागल फेस बुकों पर लिखते हैं,गाते हैं
आप पार्टी भाग्य - विधाता बतलाते हैं
मैं लिखता था, मुझको भी गाली देते थे
तारीफ करो झूठी तो सब ताली देते थे
छोड़ मिडिया, आशूतोष, अब हैे भीडों में
कच्चे अण्डे फूट रहे हैं, द्रुम नीडो में
कविराज तो भाट बना पागलखाने का
अच्छा मौका हेै, अय्यासी गर्माने का
जनता कितनी सस्ती है ज्ञान हो गया
दिल्ली के जनमत से अनुमान हो गया
बोट-बैंक से मेरा भारत भटक गया है
कवि‘आग’का छन्द हवा में लटक गया है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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