उत्तराखण्ड की सियासत
जनता, नेता, अभिनेता सब बिक जाता है
प्रजातन्त्र का कूडा करकट दिख जाता है
प्रजातन्त्र में सबकी अपनी औखातें हैं
राजनीति में नेता बातो की खाते हैं
बडे. - बडे नेताओं की लगती है बोली
देखो जनमत की ये कैसी आंख मिचैली
जनता की ताकत से नेता बन जाता है
चौराहे में बिकता है बस, धन खाता है
टिहरी, पौडी और कुमाउॅं के देखो पंगे
उत्तराखण्ड को थाम रहे लावारिस नंगे
अपने - अपने दावे दोनो ठोंक रहे हैं
प्रजातन्त्र के परमिट देखो भौंक रहे हैं
एक चना भी भाड़ फोड़ कर दिखलाता है
यू.के.डी. की इज्जत का ये बईखाता है
इन सबका अब बाप यंहा पर पैसा ही हैे
ये राजनीति है ,इसमें सब कुछ ऐसा ही है
देव-भूमि की जनता ने इतिहास बनाया
फिर से पागल-पन का जनमत कैसेे आया
क्यों जनता ,कारण बनती है इस बर्बादी का
अब जुगाड का खेल, खुशामद में खादी का
राजनीति में जयचन्दो की देखो लीला
आज सियासत सडा रही है कौम कबीला
बे- भाव का माल , कीमती बन जाता है
कमजोरी में गधा बाप क्यों कहलाता है
लोकतन्त्र का पत्थर हीरा काट रहा है
उत्तराखण्ड को लावारिस ही चाट रहा है
मुख्यमंत्री कौन बनेगा अब ये पंगे
मान , प्रतिष्ठा , अभिलाशा में सारे नंगे
लगे हुये हैं जोड़ -तोड़ में सभी खिलाडी
उॅंचे - उॅंचे पर्वत से बनती है खाडी
हरक सिंह फि लक्षा-गृह में वापस लौटा
उत्तराखण्ड की सत्ता में अभ्यस्त मुखौटा
ताल ठोकता विजय बहुगुणा आगे आये
अधकच्चे भोजन को अब तक किसने खाया
सतपाल भी अपने डोरे डाल रहा है
लावारिस मंत्री को कब से पाल रहा है
ये बेचारा नमक की कीमत चुका रहा है
अब टुच्चा नेता धर्मगुरू को झुका रहा है
अब निशंक भी मौन हुआ कुछ बोल रहा है
इसका मन भी कुर्सी में ही डोल रहा है
उॅंट, अष्व, प्यादे सतरंजी खेल रहे हैं
अपने - अपने सभी खटारा ठेल रहे हैं
अब तो एक्सीलेटर धूॅंआ छोड़ रहा है
पटक-पटक कर सिर कुर्सि से फोड़ रहा है
सभी जूगाडू सत्ता ने सिरमोर बनाये
मेरे घर में दिल्ल वाले हुक्म चलाये
आज नपुंसक राजनीति से क्या आशा है
ये कवि आग की आग धधकती परिभांषा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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