Monday, April 4, 2016

सिद्यान्त
कुत्तों का जब जमघट देखा मैं भी था आवाक खडा
मेरा कुत्ता मेरे घर से बोट डालने निकल पडा
चौराहे में पूॅंछ उठाये, सब आपस में सूॅंघ रहे थे
कुछ चिल्लाकर हार गये थे, थके हुये थे उॅंघ रहे थे

ना रगडा था ना झगडा था,आपस में मुॅंह चाट रहे थे
लोकतन्त्र की खुशियाॅं,सारे कुत्ते मिलकर बाॅंट रहे थे
कुत्ते मजहब, क्षेत्र ,जाति के संस्कारों को, भूल गये
भारत मां के सारे कुत्ते संविधान में , झूल गये

ना बी.जे.पी.,ना काॅंग्रेस, ना कम्युनिष्ट के झण्डे थे
ना स.पा,बा.स.पा,दक्षिण पंथी, शिव सेना मुस्टण्डे थे
ना लोकपाल, ना काले धन के धोती और लंगोटे थे
ना हिन्दू, मुस्लिम,सिक्ख,इसाई,आरक्षण के कोटे थे

गाॅंधी के तीनो बन्दर भी बजरंग दल के खास हो गये
खादी ,चर्खे आज देश में,जनता के उपहास हो गये
राजनीति के सारे दल,बल हम कुत्तों से गिरे हुये हैं
बिन वर्षा के बादल, दिनकर की छाती पर घिरे हुये हैं

छल, बल, कपटी मानवता की सारे कुत्ते रोटी खायें
ये चमत्कार होगा ,भारत में, कुत्ते राजनीति में आएं
कठिन समय में तृष्कारी भी आविष्कारी बन जाते हैं
ये भारत के वो सपूत हैं, घर - घर के टुकडे़ खाते हैं

आज सुरक्षा ,गली मुहल्लों की केवल कुत्ता करता है
हम जैसे चोरों की चौकीदारी में कुत्ता मरता है
चाल,चरित्र और चेहरों में भी हम कुत्तों से गिरे हुये हैं
सारे नेता राष्ट्र - द्रोह के षडयन्त्रों में घिरे हुये हैं

आज देश में कुत्ता होना कम गौरव की बात नही है
मानव होकर हममें भी तो, मानवता जज्बात नही है
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह से मानवता गिरती जाती है
कुत्तों की पीढी युग-युग से वफादार क्यों कहलाती है

ना राष्ट्र-गीत,ना डन्डा,झण्डा, संविधान कानून नही है
जिसकी रोटी हम खाते हैं, अपना जग में मीत वही है
कवि आग ने हर छन्दो में, राष्ट्र, धर्म की बात कही है
गली,मुहल्ले अगर सही हैं,अपना हिन्दुस्तान सही है।।
 राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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