Friday, April 29, 2016

केवल शास्त्रज्ञ एवं साधको के लिये

योगः चित्तवृत्ति निरोधः
पातञ्जलि का आयुर्वेद और योग सभी को भाता है
अष्टांग योग के पांच अंग तो बाबा कब से गाता है
अब ध्यान, धारणा,और समाधी,कौन हमें समझायेगा
योग सध गया बाबा जी फिर बिजनेस कौन चलायेगा

कई जन्मो की कठिन तपस्या से परिणाम निकलता है
सुयोग्य शिष्य की परम्परा से धर्म हमेशा फलता हेै
विज्ञापन,सौन्दर्य प्रसाधन पातञ्जलि का काम नही है
माया की दुनिया का साधू, धर्मो का अन्जाम नही है

आटा,चावल,मिर्च, मशाला, पातञ्जलि का शोध नही है
कवि आग हूं मेरे चिन्तन मन्थन में अवरोध नही है
राम देव का नाम बिके तो इसमें कुछ भी क्रोध नही है
पातञ्जलि का नाम चलेगा,फिर बाबा को बोध नही है

हे, धर्म भेष के मुर्दो जागो धर्म पडा है चौराहो में
ऋषि, मुनि,भगवान बिकेगें, व्यवसायी की ही बाहों में
सब बाबा का जाप करो अब धर्म-कर्म निपटाने को
अब कालनीमि तैयार खडे हेेै,उद्योग जगत में आने को

बाबाओं में की प्रतिष्पर्धा है अब मण्डी नयी लगाने की
धर्मो में तो भगवानो की कीमत हेै दो आन्ने की
टूथ, पेस्ट, कच्छे, बनियाने, गुप्त-अंग, नव-रंंग बनाओ
काम-देव की दुनिया में भी पातञ्जलि को खूब नचाओ

जब बबा का उद्योग शुद्व हेै, क्या जरूरत विज्ञापन की
हजार करोड की एक लंगोटी, फिर भी इच्छा है धन की
योगी का मन मचल रहा है विश्व-गुरू बन जाने का
अब बाबाओ का काम यही है,धर्म पन्थ भटकाने का

मुर्दो के शव चिता बनाकर भस्मि-भूत कर डालूंगा
मै ऋषि,मुनि,उपनिषद,शास्त्र को आत्मसात कर पालूगा
धर्मो के हर व्यवसायी पर, कवित्त छन्द से थूकूंगा
मै कवि आग हूँ आडम्बर को अग्नि शिखा से फूकूंगा।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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