अहिसुष्णता
पूरे भारत में ढूँढोगे कंही खुशी की खबर नही है
योगी,भोगी और विरक्ति पागल हैं, पर सबर नही है
सम्प्रदाय,मजहब के झगडे भारत में फल फूल रहे हैं
जांति-पांति और कौम, कबीले शाखाओं पर झूल रहे हैं
नेताओं की हर भांषा में शब्द निरकुंश बोल रहे हैं
शब्दो के सौदागर ,शब्दो की मर्यादा तोल रहे हैं
राष्ट्र-भक्ति की भांषाओ से राष्ट्र स्वंय दम तोड रहा हेै
हिन्दू,मुस्लिम ,सिक्ख, इसाई अहिसुष्णता जोड रहा है
वैमनस्य के हवन - कुण्ड में नेता ईंधन डाल रहे हैं
प्रजातन्त्र के इस कीचड में वाेट - बैंक खंगाल रहे हैं
शब्द निरंकुश हो जाते है, नेताओं की इस भांषा से
केवल भारत ही मरता हेै राजनीति की परिभांषा से
वाणी-भूषण, बुद्वि-बल्लभ कफन ओढ कर शान्त पडे हैं
पद्म-विभूषण की कतार में,सारे शव, सम्भ्रान्त खडे हेैं
भाट,चारणो की कलमों से श्रृंगार स्वंय दम तोड रहा है
क्यों माँ शारदा के पुत्रों में आडम्बर गठजोड रहा है
अगर देश में प्रतिभाओं की कलम आग को सुलगाती हेै
शमषीरों सी कलम, इलम से,राष्ट्र गीत खुलकर गाती है
अग्नि शिखा निष्पक्ष बने, बस, शोले शबनम फेैलाये
राष्ट्र द्रोह के नरभक्षी को, कलम - कलम करके खाये
कवि,लेखक,साहित्यकार की धधक ज्वाल की पुञ्ज बने
आर्यखण्ड की वशुन्धरा, मथुरा, बृन्दावन कुञ्ज बने
अहिसुष्णता के कण्टक पथ, सहिसुष्ण रथवान बनेंगे
केवल कवियों की रचना से, जनमत हिन्दुस्तान रचेंगे
मैं अन्तिम अभिलाशा के स्वर,नश्वर तन पर फैंक रहा हूँ
भारत माँ की लुटि अस्मिता आयामो से देख रहा हूँ
मुर्दो पर ग्लूकोष चढाकर ,लिखते - लिखते हार गया हॅूं
मै कवि आग हूँ ,अंगारा हूँ, लपटों के भी पार गया हूँ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815

No comments:
Post a Comment