पर्यावरण से सावधान
आदमी अभिशाप बनता जा रहा है श्रृष्टि में
जगपिता भी रो रहा है आज अपनी दृष्टि में
जल,जीव,जन सुन्दर प्रकृति श्रृष्टि का आधार है
पर्यावरण की लुप्तता ही जीव का संहार है
जगल जमी,जनजीव,जीवन लुप्त होता जारहा है
देख लो ये आदमी , विज्ञान, कुदरत खा रहा है
युद्ध है आकाश में ओजोन मंडल फट गया
द्वन्द की दुनिया में देखो जल,जमी,नभ बंट गया
स्वास्थ की सम्पन्नता को जंगलो से तोलते थे
कैसा खजाना कुदरती मेरे वतन को बोलते थे
दिन रात जंगल कट रहा है आदमी के हाथ से
ये राष्ट्र ही मर जायेगा आकाल के आघात से
कितनी जडी और बूटियां जंगलो में पल रही थी
संजीवनी उपचार की हर युगो से मिल रही थी
बन गयी इतिहास औषध वृक्ष गायब होगये
देख लो गंजे शिखर कैसा अजायब हो गये
भू-चाल है भू-कम्प है ज्वालामुखी का ग्रास है
जानें कितने रोग हैं जन-जन में जीवन त्रास है
जगल,जमीं अवलम्ब था इस श्रृष्टि के सोपान में
विज्ञान बनता जा रहा है काल हिन्दुस्तान में
लुप्त था जो जल जमीं में खो गया पाताल में
विज्ञान भी है बे-खबर आकाल के इस काल में
हर नदी में डाम हैं बिजली बनाने के लिये
मजबूर है विज्ञान भी श्रृष्टि चलाने के लिये
जल से बिजली ठीक बिजली से जल ना पाओगे
हर जीव का आधार जल,बोलो कहां से लाओगे
रोकते थे वृक्ष जल को , कट गये बे-भाव से
हर जीव ‘चातक’ बन गया विज्ञान के प्रभाव से
छोटे - छोटे डाम हों जंगल जमीं बचती रहे
श्रृष्टि भी तकनीक से कुछ नया रचती रहे
विद्युत भी हो, जलवायु तो बात बनती जायेगी
अन्यथा इस आदमी को आवश्यकता खायेगी
भाष्कर की पुन्ज को ओजोन कैसे शोकता था
उस भयंकर लौ किरण कोशून्य में ही रोकता था
मांगती जितनी धरा, उतनी तपस को छेाडता है
ओजोन की इस पर्त को विज्ञान कैसे तोड.ता है
कारण बना है हर तरफ से श्रृष्टि को संहार कर
खेा गया ऋतु का नियम पर्यावरण से हार कर
अब भी समय है श्रृष्टि में पर्यावरण बच पायेगा
विज्ञान से तो आदमी बे - मौत मारा जायेगा
रोग हैं अकाल हैं कहीं बाड. जीवन खायेगी
श्रृष्टि में प्रलय भयंकर बे - समय आ जायेगी
फिर कहां विज्ञान हम तुम ना धरा रह जायेगी
अस्मिता ब्रह्माण्ड की विज्ञान से बह जायेगी
विज्ञान भी हो और प्रकृति आदमी आधार हो
एेसी ना हो प्रतिकूलता सोंन्दर्य का संहार हो
पर्यावरण, विज्ञान से श्रृष्टि नयी बन जायेगी
इस धरा की दिव्यता ब्रह्माण्ड की हो जायेगी ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

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