मौन है अविचल हिमालय राष्ट्र - रक्षा के लिये
ग्लेशियर गलता है तो गंगा सुरक्षा के लिय
हम सींचते हेैं देश को बस आबोदाने के लिये
मजबूर हॅूं मैं अब सियासत् को डिगाने के लिये!
पहाडों के स्वर
उत्तराखण्ड बर्बाद हुआ हैे राजनीति जज्बातों में
जनमत कहता है शासन हो केन्द्र समपित हाथों में
जो भी शासन में आया,उसने ही पहाड़ को नोचा हेै
उत्तराखण्ड का निर्णय दिल्ली में हो, कैसा लोचा है
गाॅंव बसाने से पहले भिखमंगे जमें पहाडों में
जल, जंगल,घरती को लूटा , राजनीति की आडों में
भू - माफिया बसे पडे़ हैं नेताओं के प्राणों में
अन्धे हैं सरदार यहां पर प्रजातंत्र के काणों में
टिहरी, पोडी क्षेत्र - वाद का वोट बैंक छंटवाते हो
ठाकुर,पण्डित , वैश्य ,शुद्र को आपस में कटवाते हो
गढवाल,कुमाउॅं की भांषा से उत्तराखण्ड को खोओगे
क्या मोक्ष - दायिनी घरती में बीज नाश के बोओगे
देख सियासी चिन्तन भी क्यों मजबूरी बन जाता है
आशीष देख लो बद्री का डाकू ही चुनकर आता है
राजनीति में स्वच्छ छवि फिर से परिणाम दिखायेगी
ये भाव-भंगिमा जनता की फिर से नालायक लायेगी
शिशुओं की तरह सियासत् जिन्हें पकड़कर लाये थे
ये मोहरे थे सतरंजो के जो हमने स्वयं बिछाये थे
जिससे भी दगा मिला हमको उसमें आग लगादो अब
हे शिखरों के स्वाभिमान ऐसी अलख जगादो अब
विश्वास यदि खुद पर हेेै ,चल पढो स्वयं के पाॅंवों पर
स्वाभिमान हो शिखरों का गायेगें घर-घर गाॅंओं पर
हे वतन वीर हम यादों से वादों को पुनः दिखायेंगें
आन ,बान, सम्मान सुरक्षित, स्वाभिमान से गायेंगें
ये भृकुटि-बंक की भांषा है सब आयेंगें औकातों में
उत्तराखण्ड में यौवन हो बस, बातों में जज्बातों में
कवि आग भी लिखता हेै, रो-रो कर आज अनाथो में
जन-मत कहता है शासन हो केन्द समपित हाथों में।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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