Monday, April 18, 2016

ईश्वर का ऐश्वर्य
मैंने ईश्वर को देखा है, वो सागर पर डोल रहा हेै
नतमस्तक होकर सागर भी ईश्वर से कुछ बोल रहा है
फिर सूरज की ओर इशारा, सागर मेंं गर्मी फैलाओ
परंपिता जल से कहता है,तुम अपना अस्तित्व मिटाओ

नीर स्वयं अस्तित्व मिटाकर,भाप बना ही उड जाता है
पाकर फिर आदेश पवन भी ,मेघ शून्य में ले जाता हेै
वृक्ष,जीव ओैर गिरि की पूजा को भी ईश्वर देख रहा है
सूखे कण्ठ, उदर सृष्टि पर वृष्टि ,दृष्टि से फेंक रहा है

पवन,पुरानी पत्ति के शव,द्रुम से अलग-थलग करती है
वही पत्तियां सडकर गलकर खाद बनी अपनी धरती हेै
सुन्दर कोमल कलियां भी तो वृक्षों पर ही इठलाती हैं
भरे बसन्त में सृष्टि संरचना उस ईश्वर के गुण गाती है

हर किसान को मौन शब्द से परमेश्वर समझाता आया
हल के फल से वशुन्धरा के शुष्क हृदय को यूं सहलाया
धरती मां आसक्त हुयी सी उदर चीर कर सब देती है
परं कृषक परमेश्वर ही है, हम सब तो उसकी खेती हेैं

धरती का श्रृंगार ,वृक्ष ही हम धरती से हटा रहे हैं
अल्प-मृत्यु की छाया हम सब मानवता पर घटा रहे हैं
वृक्षों का सौन्दर्य खजाना, जल धरती में बांट रहा है
मानव विकसित होकर के भी,मां की छाती काट रहा है

धर्म,मोक्ष की इस धरती में जल का हा-हा कार मचा है
विभत्स,रोद्र का दृष्य देश में मानवता ने आज रचा है
ऊँची - ऊची भवन शिखाएं अहंकार से खेल रही हैं
धर्म-धाम का बोझा धरती माता ही तो झेल रही है

सत्,रज,तम की तीन प्रकृति,असमंजस में सोच रही हैं
मानवता की बर्बरता पर,श्रृष्टि स्वयं को नोच रही है
सौन्दर्य,श्रृजन सुकुमार शिशू आज अचेतन मुर्झाया है
वशुन्धरा ने आज जगत में,मानवता से क्या पाया है

फिर भी हम सब मानव होकर, परंपिता को भूल रहे हेैं
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह के पञ्चतत्व में झूल रहे हैं
उस ईश्वर के अहसानो की प्रेम वृष्टि को तो पहचानो
कवि आग,इस वैमनस्य को, छोडो बस, ईश्वर को मानो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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