Wednesday, April 6, 2016

लकीर के फकीर
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादो में डाल रहा हेै
कुर्बानी को कट्टर पन का फतवा ही तो पाल रहा हेै
हर कौमो में कट्टर पन के भरे हुये साढू भाई हेैं
रामायण,गीता, कुरूआन भी कटंटर पन से शर्मायी है
मजहब में जेहाद हमेशा, धर्म-पन्थ जंजाल रहा है
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादों में डाल रहा हेै

शब्दो के बर्छी - भालों से मजहब शान्त कंहा होते हैं
इन झगडों में सरल चित्त के जनमानस ही तो रोते हैं
कोई मजहब मुझे बतादो जो गरीब को पाल रहा हो
ऐसा सम्प्रदाय भी ढूंढो जिस में लय,सुर,ताल रहा हो
मानवता में मजहब, भूखे, नंगे ही खंगाल रहा हेेै
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादों में डाल रहा हेै

मन्दिर, मस्जिद के गारे में दोनो कौमे धंसी पडी हेै
राजनीति में कट्टर पन की जिन्दी लाशें फंसी खडी हेै
कुर्बानी कट्टर मुर्दो की कब्रिस्तान बनाती हेै
कौम,कबीलों की लाशें ही, जिन्दी लाशों को खाती हेै
अरे उवेैसी, धर्म, मजहब में क्यों बकरे तू पाल रहा हेेेै
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादों में डाल रहा हेै

जिस भारत में तू रहता हेै,उसका कुछ अनुमान नही है
हे शब्दो के बाजीगर, इस सर्कस का सम्मान नही है
पूरी दुनियां कट्टर पन के मूंह में हर दम थूक रही हेै
कुछ कौमे हेेैं कोव्वे जैसी, कोयल बनकर कूक रही है
कट्टर चाहे कोइ भी हो, कौमो का ही काल रहा है
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादों में डाल रहा हेै

हर कौमो में अच्छे - बूरे, मन्दे, बन्दे मिल जाते हैं
फुलवारी में कलि, फूल संग कांटे भी तो खिल जाते हेैं
सभी फूल को सहलाते हैं, कांटो को तृष्कार मिला है
जो भी मजहब में अच्छा है,उसको हरदम प्यार मिला हेै
धर्म,मजहब क्यों मरूधान को मरूस्थल में ढाल रहा हेै
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादों में डाल रहा हेै

धर्म धारणा सम्प्रदाय, मजहब से उठकर ही बनती है
आतंकवाद को अल्लाह,ईश्वर की पीढी ही क्यों जनती है
धर्म वही हेै जो मानव में भेद - भाव की रूढी तोडे
एक सूत्र में मानवता से माला के मनको को जोडे
कवि आग अपनी कविता से झगडों को ही टाल रहा है
एक उवैसी पूरी कोैम को जेहादों में डाल रहा हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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