है खटकता एक सबकी आँख पर
शोभता है दूसरा सुर शीश पर
कुल की बढाई किस तरह से काम दे
जो जरा भी हो बडप्पन की कसर
कलाम सलाम-मेमन-बे-मन
क्यों एक मरता है वतन के नाम पर
क्यों दूसरा शूली चढा बदनाम पर
एक ही मन्जर,मजहब के फूल थे
ये फैसला होता है बस,अन्जाम पर
एक मरता है वतन को तोडकर
एक मरता है वतन को जोडकर
काम से ही तो कसौटी बोलती है
इमान बनता है, दगा को मोडकर
एक ही दिन है मुकरर्र भी दफन का
भेद है केवल शरीरो के कफन का
एक को चाहती है दुनिया शौक से
देखते हो दूसरे का हस्र फन का
मै आग लिखता हूँ तपाने के लिये
ये गीत है माँ को सुनाने के लिये
ये वतन सबको हृदय में धारता है
बस, आग मेरी है जमाने के लिये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
शोभता है दूसरा सुर शीश पर
कुल की बढाई किस तरह से काम दे
जो जरा भी हो बडप्पन की कसर
कलाम सलाम-मेमन-बे-मन
क्यों एक मरता है वतन के नाम पर
क्यों दूसरा शूली चढा बदनाम पर
एक ही मन्जर,मजहब के फूल थे
ये फैसला होता है बस,अन्जाम पर
एक मरता है वतन को तोडकर
एक मरता है वतन को जोडकर
काम से ही तो कसौटी बोलती है
इमान बनता है, दगा को मोडकर
एक ही दिन है मुकरर्र भी दफन का
भेद है केवल शरीरो के कफन का
एक को चाहती है दुनिया शौक से
देखते हो दूसरे का हस्र फन का
मै आग लिखता हूँ तपाने के लिये
ये गीत है माँ को सुनाने के लिये
ये वतन सबको हृदय में धारता है
बस, आग मेरी है जमाने के लिये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
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