लाश में आस
लोकसभा और राज्यसभा में सारे जोकर लटक रहे हेैं
रिंग मास्टर अपनी चाबुक चिल्ला करके पटक रहे हेैं
शेर , भेडिये, भालू, बन्दर सब आवारा घूम रहे हैे
ये सराय भारत का संसद ,मस्त कलन्दर झूम रहे हेै
तर्क-कूर्तक के अर्क नर्क से,शब्द बाण सब छोड रहे हेै
अपना-अपना घडा पाप का संसद मे ही फोड रहे है
मनोरंजन का सीधा प्रसारण सब जनता देख रही है
प्रजातन्त्र की इस सर्कस से, दुनिया आँखे सेंक रही है
सब संविधान के पन्ने लेकर कानूनो को ढूँढ रहे हेैं
ये प्रजातन्त्र के सारे नव्वे, नव्वो को ही मूँड रहे हैं
मैं सपा, बा.स.पा,बी.जे.पी ,मैं जनता दल ,मैं कांग्रेस
मैं ममता,समता,ललिता हूं,मैं समाजवाद में अखिलेष
मैं पासवान मैं नासवान हूँ ,मैं लालू का चमत्कार
मैं अन्ना द्रुमक मैं तृणमूल, मैं प्रजातन्त्र में गधा भार
मैं निर्दलीय मौका-परस्त, मैं अस्त-व्यस्त मैं लाचार
हम सब सर्कस के कलाकार हैं ,सरकारो के मददगार
इन टूटे - फूटे अपशिष्टों की ये संसद गोदाम हो गयी
बानप्रस्त में हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई धाम हो गयी
कूडे करकट की खादों से गाजर घासें चमक रही है
प्रजातन्त्र के मन्दिर ,संसद में ये लाशें दमक रही है
भूत,पिचास,और जिन्न,निशाचर,हर कोने में भाग रहे हैं
हम, तुम जिन्दे सुप्त पडे हैे,ये मुर्दे ही जाग रहे हैं
प्रजातन्त्र के इस सर्कस का आओ मिलकर लुफ्त उठायें
कवि आग की मजबूरी है, गरूड पुराण मुर्दो का गायें।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
लोकसभा और राज्यसभा में सारे जोकर लटक रहे हेैं
रिंग मास्टर अपनी चाबुक चिल्ला करके पटक रहे हेैं
शेर , भेडिये, भालू, बन्दर सब आवारा घूम रहे हैे
ये सराय भारत का संसद ,मस्त कलन्दर झूम रहे हेै
तर्क-कूर्तक के अर्क नर्क से,शब्द बाण सब छोड रहे हेै
अपना-अपना घडा पाप का संसद मे ही फोड रहे है
मनोरंजन का सीधा प्रसारण सब जनता देख रही है
प्रजातन्त्र की इस सर्कस से, दुनिया आँखे सेंक रही है
सब संविधान के पन्ने लेकर कानूनो को ढूँढ रहे हेैं
ये प्रजातन्त्र के सारे नव्वे, नव्वो को ही मूँड रहे हैं
मैं सपा, बा.स.पा,बी.जे.पी ,मैं जनता दल ,मैं कांग्रेस
मैं ममता,समता,ललिता हूं,मैं समाजवाद में अखिलेष
मैं पासवान मैं नासवान हूँ ,मैं लालू का चमत्कार
मैं अन्ना द्रुमक मैं तृणमूल, मैं प्रजातन्त्र में गधा भार
मैं निर्दलीय मौका-परस्त, मैं अस्त-व्यस्त मैं लाचार
हम सब सर्कस के कलाकार हैं ,सरकारो के मददगार
इन टूटे - फूटे अपशिष्टों की ये संसद गोदाम हो गयी
बानप्रस्त में हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई धाम हो गयी
कूडे करकट की खादों से गाजर घासें चमक रही है
प्रजातन्त्र के मन्दिर ,संसद में ये लाशें दमक रही है
भूत,पिचास,और जिन्न,निशाचर,हर कोने में भाग रहे हैं
हम, तुम जिन्दे सुप्त पडे हैे,ये मुर्दे ही जाग रहे हैं
प्रजातन्त्र के इस सर्कस का आओ मिलकर लुफ्त उठायें
कवि आग की मजबूरी है, गरूड पुराण मुर्दो का गायें।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment