Wednesday, July 15, 2015

                      जागो
इस  राजनीति  के  तराजू   में  हमें  मत  ताेलिये
सम्मान देना  है अगर  तो   बस  कवि ही बोलिये
हम हृदय के  हादसों   की  हर हदों   को  खोलते हैं
सत्यता  से  शब्द   को  निर्वस्त्र   करके  बोलते है

वास्तविकता भ्रष्टता की  हम  तुम्हें  दिखला रहे हैं
हर छन्द में  हम बीहडों  के   डाकुओ को ला रहे हेैं
ये  सियासी  लेखनी   की  नोक   से  घबरा  रहे हैं
मेरा वतन जिन्दा रहे, हम  गीत लिखते जा रहे हेेैं

ये  वतन, पैसा   हमारा,  किस  तरह  से फूँकते हैं
जनमतो  की  भीख  से, मूँह  पर  हमारे  थूकते हैं
इन डाकुओं  को आग से औकात में  मैं  ला रहा हूँ
इसलिये  कर्कस ध्वनि के गीत   हरदम गा रहा हूँ

सोते  हुये  मुर्छित  नरो  को , मैं  जगाता  जाउँगा
शब्द  में  लिपटा  हुआ, मैं  हर  जहन में  आउँगा
कौशिस में  हूँ  कि  फिर  लगादूं  आग  पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेगे  फिरका परस्ती भेष में

बस, होलियाँ  जलती  रहें,  प्रहलाद  बचने चाहिये
इस  देश  की  भटकी   जवानी   में  रवानी  लाइये
प्रतिकार को बस ठानलो खुलकर सडक पर आइये
इतिहास  की  इज्जत बचे, कुछ  गीत  ऐसे गाइये

सब   सियासी   राष्ट्र - हित नीलाम  करते  जायेंगे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  रोज मरते जायेंगे
कौमो,  कबीलों,  सम्प्रदायों   में  हमे  ये  बाँटते हैं
इस  राष्ट्र को  ये केक  की भाँति सडक में काटते है

किसान  के  घर  बोरियां  थी, अब कनस्तर हेै नही
दो - वक्त  की  रोटी  गरीबों   को  मयस्सर  है  नही
खाद्यान्न  की  कीमत  हमे  बे-वक्त शूली  टाँगती हेै
अब  देश  की सत्ता सियासत वक्त हमसे  माँगती है

झण्डे - डण्डे, इन  डाकुओं  के  अब  उठाना छोड दो
सब  पोस्टर,  बैनर  हटाओ,  हर  भ्रम  को  तोड दो
अब  राष्ट्र  के  हर  खर्च  का   हिसाब   भी  लेते रहो
कुछ  खौंप  भी  पैदा  करो, कुछ  चोट  भी  देते रहो

राष्ट्र  का उत्सव नही बस,अपना  मनाना  जानते है
लुट  रहा  है  धन  हमारा, ये भाँग अपनी  छानते हेै
इन  हरकतों  का  हर  तरफ  अवरोध  होना चाहिये
मैं  आग  हूँ, मुझ पर  भी  थोडा  शोघ होना चाहिये।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     मो0 9897399815
            rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment