जागो
इस राजनीति के तराजू में हमें मत ताेलिये
सम्मान देना है अगर तो बस कवि ही बोलिये
हम हृदय के हादसों की हर हदों को खोलते हैं
सत्यता से शब्द को निर्वस्त्र करके बोलते है
वास्तविकता भ्रष्टता की हम तुम्हें दिखला रहे हैं
हर छन्द में हम बीहडों के डाकुओ को ला रहे हेैं
ये सियासी लेखनी की नोक से घबरा रहे हैं
मेरा वतन जिन्दा रहे, हम गीत लिखते जा रहे हेेैं
ये वतन, पैसा हमारा, किस तरह से फूँकते हैं
जनमतो की भीख से, मूँह पर हमारे थूकते हैं
इन डाकुओं को आग से औकात में मैं ला रहा हूँ
इसलिये कर्कस ध्वनि के गीत हरदम गा रहा हूँ
सोते हुये मुर्छित नरो को , मैं जगाता जाउँगा
शब्द में लिपटा हुआ, मैं हर जहन में आउँगा
कौशिस में हूँ कि फिर लगादूं आग पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेगे फिरका परस्ती भेष में
बस, होलियाँ जलती रहें, प्रहलाद बचने चाहिये
इस देश की भटकी जवानी में रवानी लाइये
प्रतिकार को बस ठानलो खुलकर सडक पर आइये
इतिहास की इज्जत बचे, कुछ गीत ऐसे गाइये
सब सियासी राष्ट्र - हित नीलाम करते जायेंगे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई रोज मरते जायेंगे
कौमो, कबीलों, सम्प्रदायों में हमे ये बाँटते हैं
इस राष्ट्र को ये केक की भाँति सडक में काटते है
किसान के घर बोरियां थी, अब कनस्तर हेै नही
दो - वक्त की रोटी गरीबों को मयस्सर है नही
खाद्यान्न की कीमत हमे बे-वक्त शूली टाँगती हेै
अब देश की सत्ता सियासत वक्त हमसे माँगती है
झण्डे - डण्डे, इन डाकुओं के अब उठाना छोड दो
सब पोस्टर, बैनर हटाओ, हर भ्रम को तोड दो
अब राष्ट्र के हर खर्च का हिसाब भी लेते रहो
कुछ खौंप भी पैदा करो, कुछ चोट भी देते रहो
राष्ट्र का उत्सव नही बस,अपना मनाना जानते है
लुट रहा है धन हमारा, ये भाँग अपनी छानते हेै
इन हरकतों का हर तरफ अवरोध होना चाहिये
मैं आग हूँ, मुझ पर भी थोडा शोघ होना चाहिये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
इस राजनीति के तराजू में हमें मत ताेलिये
सम्मान देना है अगर तो बस कवि ही बोलिये
हम हृदय के हादसों की हर हदों को खोलते हैं
सत्यता से शब्द को निर्वस्त्र करके बोलते है
वास्तविकता भ्रष्टता की हम तुम्हें दिखला रहे हैं
हर छन्द में हम बीहडों के डाकुओ को ला रहे हेैं
ये सियासी लेखनी की नोक से घबरा रहे हैं
मेरा वतन जिन्दा रहे, हम गीत लिखते जा रहे हेेैं
ये वतन, पैसा हमारा, किस तरह से फूँकते हैं
जनमतो की भीख से, मूँह पर हमारे थूकते हैं
इन डाकुओं को आग से औकात में मैं ला रहा हूँ
इसलिये कर्कस ध्वनि के गीत हरदम गा रहा हूँ
सोते हुये मुर्छित नरो को , मैं जगाता जाउँगा
शब्द में लिपटा हुआ, मैं हर जहन में आउँगा
कौशिस में हूँ कि फिर लगादूं आग पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेगे फिरका परस्ती भेष में
बस, होलियाँ जलती रहें, प्रहलाद बचने चाहिये
इस देश की भटकी जवानी में रवानी लाइये
प्रतिकार को बस ठानलो खुलकर सडक पर आइये
इतिहास की इज्जत बचे, कुछ गीत ऐसे गाइये
सब सियासी राष्ट्र - हित नीलाम करते जायेंगे
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई रोज मरते जायेंगे
कौमो, कबीलों, सम्प्रदायों में हमे ये बाँटते हैं
इस राष्ट्र को ये केक की भाँति सडक में काटते है
किसान के घर बोरियां थी, अब कनस्तर हेै नही
दो - वक्त की रोटी गरीबों को मयस्सर है नही
खाद्यान्न की कीमत हमे बे-वक्त शूली टाँगती हेै
अब देश की सत्ता सियासत वक्त हमसे माँगती है
झण्डे - डण्डे, इन डाकुओं के अब उठाना छोड दो
सब पोस्टर, बैनर हटाओ, हर भ्रम को तोड दो
अब राष्ट्र के हर खर्च का हिसाब भी लेते रहो
कुछ खौंप भी पैदा करो, कुछ चोट भी देते रहो
राष्ट्र का उत्सव नही बस,अपना मनाना जानते है
लुट रहा है धन हमारा, ये भाँग अपनी छानते हेै
इन हरकतों का हर तरफ अवरोध होना चाहिये
मैं आग हूँ, मुझ पर भी थोडा शोघ होना चाहिये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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