Sunday, July 19, 2015

                     हरेला
हरियालियों   में   भी  हरेला  आ गया
देख   लो     कुदरत    करेला  आ गया
भू -  माफिया  चरने  चरेला  आ गया
ये   नया     धरती    धरेला    आ गया
बो दिया  नेता   ने   फोटो   खिंच गयी
फिर  प्रकृति   आदमी   से  भिंच गयी
माफियाओं   में   धरा   बिक  जायेगी
ये   हरेला     गीत     किसके   गायेगी
हर  वर्ष  पौधों  को  धरा  ही  ढो  रही है
कट गया  जिन्दा  ,जवानी   रो  रही हेै
जिसने लगाया,  वो  लगाकर मौन हेै
इस धरा का   आज    मालिक कौन है
खुद  लगाओ  खुद  उसी  को  काट दो
पीढीयोें    में     कुदरतों    को  बाँट दो
क्या  उम्र  पेडों   की   कभी  पूरी हुयी
मौत  भी    निर्मम   हुयी,  बूरी  हुयी
गाँव और   शहरों  में  मौते बोलती हेै
सरकार भी तो कुदरतों को तोलती है
सडके   बनेगी,  वृक्ष    कटते  जायेंगे
हरियालियों के गीत हम सब गायेंगे
कुदरतों  को  जानवर   ही  पालता है
आदमी     पर्यावरण     खंगालता है
प्रदूषणो  से  रोज   मरता  जा  रहा है
ये  मरेला,   फिर    हरेला  गा  रहा है
संकल्प लो   हरियालियाँ  बचती रहेें
ये कुदरतें  भी  कुछ  नया  रचती रहें
श्रृंगार  धरती  का  हरेला   हो गया हेै
वृक्ष तो अब  आग  में ही खो गया है।। 
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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