फांसी में उदाशी
मुशलमान को फांसी दो,इस्लाम उन्हें उकसाता है
फांसी हिन्दू को दे दो तो,भगत सिंह को गाता हेेै
अगर सिक्ख फांसी पर लटके,भीड़ सडक पर लाता हेै
ईशा, मूसा भी अपने मजहब को ,खूब भुनाता है
मेमन की फांसी ने भारत के सम्प्रदाय सब जोड दिये
राजीव पी.एम. के हत्यारे घर के लोगों ने छोड़ दिये
आशा राम के अधिवक्ता, कंही जेठमलानी, स्वामी है
सब छल, बल वाणी - भूषण हैं, पैरोकारी के दामी हैं
आतंक - वाद को कुर्बानी की परिभांषा में लाते है
दहसत गर्दी, आतंकी आदर्श स्वयं बन जाते हैें
क्या मतलब हैे, संविधान की धारा ओैर कानूनो का
अपराधी कोई मजहब हो,क्या मुल्य नही है खूनो का
अपराध घिनौने बढते है, न्यायालय,मुर्दे हाथों में
अधिवक्ता उन्हें बचाते हैं ,जो घात लगाये घातों में
कानून नपुंशक बना दिया,इन तर्कों और कु-तकों ने
अब डान शब्द इजाद किया,इन राजनीति के गुर्कों ने
क्यों राष्ट्र पति पर फांसी की अपील, दलीलें जाती है
क्यों न्याय व्यवस्था,संविधान की धारा से शर्माती है
सरे आम गवाही बिकती हेै,हर कोर्ट,कचहरी परिसर में
कानूनों की नौकाएं क्यों डूब रही सरिता सर में
कानून अगर अन्धा होगा ,ये घटना बढती जायेगी
न्याय तुला की आंखो की पट्टी ही,न्याय को खायेगी
धृतराष्ट्र भी अन्धा था,महा - भारत सबने देखा हैे
गान्धारी की आंखो में, पट्टी की सीमा रेखा है
स्वयं कृष्ण की बातों का भी अन्धों ने उपहास किया
उसी कृष्ण की गीता को भी संविधान ने पास किया
जो शपत उठातें गीता की,क्या उन पर आज भरोसा हेै
आतंकवाद को जज, मुजरिम, कानून ने,पाला पोसा है
अब पैरोल पर अपराधी छुटते हैं, शहन शाहों से
बे-गुनाह जेल में मरते हैं,इस राजनीति की आहों से
अब पांच सितारा होटल है, ये राजनीति जल्लादों का
कानून सहारा बनता है, हर सत्ता के सहजादों का
कुछ तो दहशत-गर्दी हो,अपराध जगत के जालिम को
जाे बैठी,गोद गुनाहों के,अब दूर करो उस तालीम को
जाति,मजहब से भारत के कानून सडक पर मत बाँटो
संसद की सर्कस में बैठे, अब संविधान को मत चाटो!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
मुशलमान को फांसी दो,इस्लाम उन्हें उकसाता है
फांसी हिन्दू को दे दो तो,भगत सिंह को गाता हेेै
अगर सिक्ख फांसी पर लटके,भीड़ सडक पर लाता हेै
ईशा, मूसा भी अपने मजहब को ,खूब भुनाता है
मेमन की फांसी ने भारत के सम्प्रदाय सब जोड दिये
राजीव पी.एम. के हत्यारे घर के लोगों ने छोड़ दिये
आशा राम के अधिवक्ता, कंही जेठमलानी, स्वामी है
सब छल, बल वाणी - भूषण हैं, पैरोकारी के दामी हैं
आतंक - वाद को कुर्बानी की परिभांषा में लाते है
दहसत गर्दी, आतंकी आदर्श स्वयं बन जाते हैें
क्या मतलब हैे, संविधान की धारा ओैर कानूनो का
अपराधी कोई मजहब हो,क्या मुल्य नही है खूनो का
अपराध घिनौने बढते है, न्यायालय,मुर्दे हाथों में
अधिवक्ता उन्हें बचाते हैं ,जो घात लगाये घातों में
कानून नपुंशक बना दिया,इन तर्कों और कु-तकों ने
अब डान शब्द इजाद किया,इन राजनीति के गुर्कों ने
क्यों राष्ट्र पति पर फांसी की अपील, दलीलें जाती है
क्यों न्याय व्यवस्था,संविधान की धारा से शर्माती है
सरे आम गवाही बिकती हेै,हर कोर्ट,कचहरी परिसर में
कानूनों की नौकाएं क्यों डूब रही सरिता सर में
कानून अगर अन्धा होगा ,ये घटना बढती जायेगी
न्याय तुला की आंखो की पट्टी ही,न्याय को खायेगी
धृतराष्ट्र भी अन्धा था,महा - भारत सबने देखा हैे
गान्धारी की आंखो में, पट्टी की सीमा रेखा है
स्वयं कृष्ण की बातों का भी अन्धों ने उपहास किया
उसी कृष्ण की गीता को भी संविधान ने पास किया
जो शपत उठातें गीता की,क्या उन पर आज भरोसा हेै
आतंकवाद को जज, मुजरिम, कानून ने,पाला पोसा है
अब पैरोल पर अपराधी छुटते हैं, शहन शाहों से
बे-गुनाह जेल में मरते हैं,इस राजनीति की आहों से
अब पांच सितारा होटल है, ये राजनीति जल्लादों का
कानून सहारा बनता है, हर सत्ता के सहजादों का
कुछ तो दहशत-गर्दी हो,अपराध जगत के जालिम को
जाे बैठी,गोद गुनाहों के,अब दूर करो उस तालीम को
जाति,मजहब से भारत के कानून सडक पर मत बाँटो
संसद की सर्कस में बैठे, अब संविधान को मत चाटो!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
मो0 9897399815
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