यह रचना10मिनट पूर्व नरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी के जज्बात पर लिखी गयी है,तथा दूसरे मित्र ने कहा की थोडा भाव विस्तृत होने चाहिये इसलिये कविता पूर्ण कर प्रस्तुत कर रहा हूं।
भावना मर गयी
मर गयी बच्ची सियासत की सडी इस भीड में
फिर फुटा गुमनाम अण्डा, सल्तनत के नीड में
बे-दर्द के ही दर्द को,अब सब सियासी देखते हैं
घाव के सम्भाव में भी,बस,रोटियां ही सेंकते हैं
किस कदर कन्या बचाने के लिये सब भौंकते हैं
दर्द में हमदर्द देखो ,सब सियासत छोंकते हैं
थोडा सहारा ध्यान से नवजात को मिलता अगर
मौत को भी हम विधाता की दया से रोकते हैं
किस कदर उपचार में भी भेद देखो हो रहा है
देश को हम तुम नही ये राज नेता खो रहा है
जान की किमत सडक पर फडफडा कर बोलती है
मर गयी नवजात पर,औकात सबकी खोलती है
नर- भक्षीयों की भीड हेमा पर लुटाती जान है
ये देश भारत था कभी,पर आज हिन्दुस्तान है
क्या कोई भी ऐसा नही था,जो बे-जुबां को देख ले
मजहबों में ये महीना, आज भी रमजान है
मुआवजों में मौत को कितना लुटाते जाओगे
तुम आदमी हो, आदमी को और कितना खाओगे
आदमी की मौत भी व्यवसाय बनती जा रही है
किस कदर अय्यासियां नव-अंकुरों को खा रही हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
भावना मर गयी
मर गयी बच्ची सियासत की सडी इस भीड में
फिर फुटा गुमनाम अण्डा, सल्तनत के नीड में
बे-दर्द के ही दर्द को,अब सब सियासी देखते हैं
घाव के सम्भाव में भी,बस,रोटियां ही सेंकते हैं
किस कदर कन्या बचाने के लिये सब भौंकते हैं
दर्द में हमदर्द देखो ,सब सियासत छोंकते हैं
थोडा सहारा ध्यान से नवजात को मिलता अगर
मौत को भी हम विधाता की दया से रोकते हैं
किस कदर उपचार में भी भेद देखो हो रहा है
देश को हम तुम नही ये राज नेता खो रहा है
जान की किमत सडक पर फडफडा कर बोलती है
मर गयी नवजात पर,औकात सबकी खोलती है
नर- भक्षीयों की भीड हेमा पर लुटाती जान है
ये देश भारत था कभी,पर आज हिन्दुस्तान है
क्या कोई भी ऐसा नही था,जो बे-जुबां को देख ले
मजहबों में ये महीना, आज भी रमजान है
मुआवजों में मौत को कितना लुटाते जाओगे
तुम आदमी हो, आदमी को और कितना खाओगे
आदमी की मौत भी व्यवसाय बनती जा रही है
किस कदर अय्यासियां नव-अंकुरों को खा रही हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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