दान मे भी शान
मनवता तो ठीक है भैया, पहले अपना घर भी देखो
जो घर में ही मरे जा रहे ,कुछ टुकडे उन पर भी फेंको
तिब्बत,बंग्ला और नैपाली, इनको तो हम पाल रहे हेैं
अन्न,धन,व्यवसाय सभी हम इन पर ही तो डाल रहे है
दया दिखाना ठीक है भैया, गर्दन पर फन्दा ना डालो
सब को अपने घर में भेजो, जो देना है वंही से पालो
हम पहले से ही डेढ अरब हैं, आधे भूखे ही सोते हैं
मंहगायी का ये आलम है ,सारे घुट -घुट के रोते हैं
उपर से बे - मौसम वर्षा ने भी तो चौपट कर डाला
हमने भूखे रहकर फिर भी हर शरणा गत को ही पाला
इज्जत पाने के चक्कर में पहले घर में नजर घुमाओ
नेता जी को क्या चिन्ता हेै,दया दिखा कर घर मे लाओ
मानवता का धर्म निभाकर हमने अपना ही खोया है
नेता जी की राजनीति से केवल भारत ही रोया है
अमितशाह तो बगला-देशी को भी घर में बुला रहे है
मेरा भारत सिकुड रहा है, ये गुब्बारे फुला रहे है
पहले घर के झगडे देखो, फिर पडोस के निपटाओ
सत्ता की मालिक जनता है अपना राष्ट्र गीत मत गाओ
नमक,तेल और लकडी का तो नेताओं को ज्ञान नही है
घर में भूख-प्यास से मरने वालो का अनुमान नही है
कालेधन वालों के पहले संचित धन को धवल बनालो
ऐसा मौका कंहा मिलेगा, सारे पापी पुण्य कमालो
इस संकट को भोगने वाले सारे तुमको ही ध्यायेगे
इज्जत शोहरत केआलावा, अवगुण के भी गुण गायेंगे
पहले अपनी चादर देखो,चरण कमल को फिर फैलाओ
बेनाम मजदूर,किसान के शव पर भी तो कफन चढाओ
कवि आग के कर्कस शब्दो से थोडा ,चमडी को सेंको
मनवता तो ठीक है भैया, पहले अपना घर भी देखो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
मनवता तो ठीक है भैया, पहले अपना घर भी देखो
जो घर में ही मरे जा रहे ,कुछ टुकडे उन पर भी फेंको
तिब्बत,बंग्ला और नैपाली, इनको तो हम पाल रहे हेैं
अन्न,धन,व्यवसाय सभी हम इन पर ही तो डाल रहे है
दया दिखाना ठीक है भैया, गर्दन पर फन्दा ना डालो
सब को अपने घर में भेजो, जो देना है वंही से पालो
हम पहले से ही डेढ अरब हैं, आधे भूखे ही सोते हैं
मंहगायी का ये आलम है ,सारे घुट -घुट के रोते हैं
उपर से बे - मौसम वर्षा ने भी तो चौपट कर डाला
हमने भूखे रहकर फिर भी हर शरणा गत को ही पाला
इज्जत पाने के चक्कर में पहले घर में नजर घुमाओ
नेता जी को क्या चिन्ता हेै,दया दिखा कर घर मे लाओ
मानवता का धर्म निभाकर हमने अपना ही खोया है
नेता जी की राजनीति से केवल भारत ही रोया है
अमितशाह तो बगला-देशी को भी घर में बुला रहे है
मेरा भारत सिकुड रहा है, ये गुब्बारे फुला रहे है
पहले घर के झगडे देखो, फिर पडोस के निपटाओ
सत्ता की मालिक जनता है अपना राष्ट्र गीत मत गाओ
नमक,तेल और लकडी का तो नेताओं को ज्ञान नही है
घर में भूख-प्यास से मरने वालो का अनुमान नही है
कालेधन वालों के पहले संचित धन को धवल बनालो
ऐसा मौका कंहा मिलेगा, सारे पापी पुण्य कमालो
इस संकट को भोगने वाले सारे तुमको ही ध्यायेगे
इज्जत शोहरत केआलावा, अवगुण के भी गुण गायेंगे
पहले अपनी चादर देखो,चरण कमल को फिर फैलाओ
बेनाम मजदूर,किसान के शव पर भी तो कफन चढाओ
कवि आग के कर्कस शब्दो से थोडा ,चमडी को सेंको
मनवता तो ठीक है भैया, पहले अपना घर भी देखो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment