चित्र काशमीर समझौते का है
उपहास का इतिहास
तुम्हे जब भीख में हमने ये पाकिस्तान दे डाला
तुम्हारे बाप जिन्ना ने किया था अपना मूँह काला
हरि सिंह के गुनाहो से इस काशमीर को टाला
ये ऐसा पाप है जिसको नेहरू ने सदा पाला
ना नेहरू ने कभी चाहा,ना गाँधी ही समझ पाया
कौशिश की थी बल्लभ ने,किसी को रास ना आया
अगर थोडी सी समझदारी ये बूढे होश मे करते
ना पाकिस्तान के मरते, ना हिन्दुस्तान के मरते
बशीयत ऐसी लिख डाली जो हमको भी अखरती है
उसी गफलत में लावारिस ,अब काशमीर धरती है
सभी सुविधा हमारी हेै, हूकूमत भी हमारी है
मेरे घर का ही खा करके सियासी जंग जारी हेै
अगर सुविधा हटादो तो ये कब्रिस्तान बन जाये
पल भर में ये जन्नत भी जहन्नुम में समा जाये
हमें क्या लाभ है इनसे ,जो अब तक पालते आये
पलते हैं मेरे घर में , और कव्वाली पाक की गाएं
कंही जिन्ना ,कंही जिया, मुर्सरफ अब नवाजी है
ये कैसा बीज है इनका,जो दुनिया भर मे पाजी है
ना खाना है ,ना दाना है बस, विस्फोट खाते हैं
इनके सब संपोले भी गजल खूनी ही गाते हैं
अमरीका से कुछ समझो जो ओसामा मिटा डाला
हिम्मत हो तो ऐसी हो जो पाकिस्तान खंगाला
मेरेे घर के संपोलों को पनाह क्यों पाक देता है
दाउद की दहशत को, क्यों हिन्दुस्तान सहता हेै
फौेजों को खुला छोडो, जो चुन - चुन कर इन्हे मारे
इन अलगाव और आतंक की नश्लों को संहारे
सियासत मौन हो जाये, मेरी फौजों में दम खम है
मेरी इस आग में पानी पडा, मुझको यही गम है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
उपहास का इतिहास
तुम्हे जब भीख में हमने ये पाकिस्तान दे डाला
तुम्हारे बाप जिन्ना ने किया था अपना मूँह काला
हरि सिंह के गुनाहो से इस काशमीर को टाला
ये ऐसा पाप है जिसको नेहरू ने सदा पाला
ना नेहरू ने कभी चाहा,ना गाँधी ही समझ पाया
कौशिश की थी बल्लभ ने,किसी को रास ना आया
अगर थोडी सी समझदारी ये बूढे होश मे करते
ना पाकिस्तान के मरते, ना हिन्दुस्तान के मरते
बशीयत ऐसी लिख डाली जो हमको भी अखरती है
उसी गफलत में लावारिस ,अब काशमीर धरती है
सभी सुविधा हमारी हेै, हूकूमत भी हमारी है
मेरे घर का ही खा करके सियासी जंग जारी हेै
अगर सुविधा हटादो तो ये कब्रिस्तान बन जाये
पल भर में ये जन्नत भी जहन्नुम में समा जाये
हमें क्या लाभ है इनसे ,जो अब तक पालते आये
पलते हैं मेरे घर में , और कव्वाली पाक की गाएं
कंही जिन्ना ,कंही जिया, मुर्सरफ अब नवाजी है
ये कैसा बीज है इनका,जो दुनिया भर मे पाजी है
ना खाना है ,ना दाना है बस, विस्फोट खाते हैं
इनके सब संपोले भी गजल खूनी ही गाते हैं
अमरीका से कुछ समझो जो ओसामा मिटा डाला
हिम्मत हो तो ऐसी हो जो पाकिस्तान खंगाला
मेरेे घर के संपोलों को पनाह क्यों पाक देता है
दाउद की दहशत को, क्यों हिन्दुस्तान सहता हेै
फौेजों को खुला छोडो, जो चुन - चुन कर इन्हे मारे
इन अलगाव और आतंक की नश्लों को संहारे
सियासत मौन हो जाये, मेरी फौजों में दम खम है
मेरी इस आग में पानी पडा, मुझको यही गम है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
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