संविधान बाबा का ढाबा
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
धर्म,मजहब के भी तो कोई खास यंहा जज्बात नही है
निर्पेक्ष कर्म है, धर्म नही है, ये विवाद ही पनपाता हेै
अपना इससे क्या लेना है, अगल - बगल का खाता है
अखण्डराष्ट्र के भारत मे क्या कौम कबीले जात नही हेै
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,सब इसमें से फूट रहे हैे
अगडे,पिछडे,उँचनीच सब वतन की मिटटी कूट रहे हेै
जातिवाद से छलकी,कलकल खरपतवारें पनप रही है
नंगी कौमे इस कीचड में, लावारिस सी कलप रही है
सम्पभुता के संविधान में जो मालिक , अनाथ वही हेै
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
इस प्रजातन्त्र के उपन्यास का पैर नही है हाथ नही है
सारे भारत के मालिक है, फिर भी तो औकात नही है
ये ग्रन्थ तो गिने,चुने कुछ वैभव-शाली को भाता हेै
एक अरब इस भीड का , बाप नही, भारत माता है
राजनीति,उद्योगपति और बाबा भी जन-जात नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
ये व्यभिचारी चोर उचक्के,संविधान के गुण ग्राहक हैं
रहते हम भी हैं,लेकिन,जीवन के क्षण,सब नाहक है
अपराधों के उत्पादो को राजनीति ही पनपाती हेै
सबसे उँची चोर,लफंगाे, की पीढी चुन कर आती हेै
संविधान के हर पन्ने में लावारिस हैं ,नाथ नही हैं
बाबा साहेब संविधान मे भारत वाली बात नही है
चार दिनो के शरणागत भी अभ्यागत बन ही जाते हैं
मेरे घर का संचित भोजन लावारिस जनमत खाते हैं
घुंस-पैठिये, अगल - बगल के पूरा संरक्षण पाते हैं
ये लावारिस वोटर हम से ज्यादा नेता को भाते हैं
अब तो ये खिचडी भारत है,दाल ही है,भात नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
सात दशक की आजादी में,रहने को घरबार नही है
गली,मुहल्ले,शहर,गांव में मानव हैं पर प्यार नही है
राम,कृष्ण की इस धरती में धर्मकर्म सम्भाव नही है
डेढ अरब की इस गिनती में भेद बहुत हैं भाव नही है
इन झगडों में अल्लाह,ईश्वर का भी कोइ हाथ नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
पूरी दुनिया को नेता जी, फिर से घर में बसा रहे हैं
लड मर कर अंग्रेज से छूटे,फिर से हमको फंसा रहे हैं
जर्मन,चीन,जापान,अमेरिका,अपने में घर बुलारहे हैं
राष्ट्र -भक्त अब देश गुलामी का गुब्बारा,फूला रहे हैं
कवि आग के शब्दो मेंं भी माँ तो है,पर तात नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
धर्म,मजहब के भी तो कोई खास यंहा जज्बात नही है
निर्पेक्ष कर्म है, धर्म नही है, ये विवाद ही पनपाता हेै
अपना इससे क्या लेना है, अगल - बगल का खाता है
अखण्डराष्ट्र के भारत मे क्या कौम कबीले जात नही हेै
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ,सब इसमें से फूट रहे हैे
अगडे,पिछडे,उँचनीच सब वतन की मिटटी कूट रहे हेै
जातिवाद से छलकी,कलकल खरपतवारें पनप रही है
नंगी कौमे इस कीचड में, लावारिस सी कलप रही है
सम्पभुता के संविधान में जो मालिक , अनाथ वही हेै
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
इस प्रजातन्त्र के उपन्यास का पैर नही है हाथ नही है
सारे भारत के मालिक है, फिर भी तो औकात नही है
ये ग्रन्थ तो गिने,चुने कुछ वैभव-शाली को भाता हेै
एक अरब इस भीड का , बाप नही, भारत माता है
राजनीति,उद्योगपति और बाबा भी जन-जात नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
ये व्यभिचारी चोर उचक्के,संविधान के गुण ग्राहक हैं
रहते हम भी हैं,लेकिन,जीवन के क्षण,सब नाहक है
अपराधों के उत्पादो को राजनीति ही पनपाती हेै
सबसे उँची चोर,लफंगाे, की पीढी चुन कर आती हेै
संविधान के हर पन्ने में लावारिस हैं ,नाथ नही हैं
बाबा साहेब संविधान मे भारत वाली बात नही है
चार दिनो के शरणागत भी अभ्यागत बन ही जाते हैं
मेरे घर का संचित भोजन लावारिस जनमत खाते हैं
घुंस-पैठिये, अगल - बगल के पूरा संरक्षण पाते हैं
ये लावारिस वोटर हम से ज्यादा नेता को भाते हैं
अब तो ये खिचडी भारत है,दाल ही है,भात नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
सात दशक की आजादी में,रहने को घरबार नही है
गली,मुहल्ले,शहर,गांव में मानव हैं पर प्यार नही है
राम,कृष्ण की इस धरती में धर्मकर्म सम्भाव नही है
डेढ अरब की इस गिनती में भेद बहुत हैं भाव नही है
इन झगडों में अल्लाह,ईश्वर का भी कोइ हाथ नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है
पूरी दुनिया को नेता जी, फिर से घर में बसा रहे हैं
लड मर कर अंग्रेज से छूटे,फिर से हमको फंसा रहे हैं
जर्मन,चीन,जापान,अमेरिका,अपने में घर बुलारहे हैं
राष्ट्र -भक्त अब देश गुलामी का गुब्बारा,फूला रहे हैं
कवि आग के शब्दो मेंं भी माँ तो है,पर तात नही है
बाबा साहेब संविधान में भारत वाली बात नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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